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जानें केजरीवाल से क्यों घबराएं हैं नरेंद्र मोदी


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नई दिल्ली ,(एजेंसी) 22 जनवरी । बात साल भर पहले की ही तो है। जैसे-जैसे नतीजे आते जा रहे थे, भीड़ बढ़ती जा रही थी। कनॉट प्लेस के पास हनुमान मंदिर के पीछे के उस बंगले की बालकनी की रौनक कुछ अलग थी। जैसे ही आम आदमी पार्टी कोई विधानसभा सीट जीतती और नेता बालकनी से इसका ऐलान करते, नीचे समर्थकों में जबरदस्त जोश आ जाता था। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली नौसिखुआ आम आदमी पार्टी (आप) ने अंतत: 28 सीटें और 29 फीसदी वोट हासिल करके न केवल दिल्ली में 15 साल से शासन कर रही कांग्रेस को बेदखल कर दिया बल्कि मुख्य विपक्षी दल बीजेपी को भी सत्ता के बिल्कुल मुहाने पर अटका दिया।

तब से राजनैतिक परिदृश्य में नाटकीय बदलाव आ चुका है. आप ने दिल्ली में 49 दिन तक सत्ता संभाली। उसके बाद लंबा समय राष्ट्रपति शासन का रहा। इस दौरान नरेंद्र मोदी की बीजेपी ने केंद्र में सत्ता कब्जा ली और दिल्ली की भी सातों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। अब यह महानगर-राज्य 7 फरवरी को विधानसभा चुनावों के अगले दौर के लिए तैयार हो रहा है। ऐसे में एक बात जस की तस है- केजरीवाल अब भी बड़ी ताकत हैं। यह बात न सिर्फ कई सारे सर्वेक्षणों से जाहिर होती है जिनमें वे मुख्यमंत्री पद के लिए पहली पसंद बनकर लगातार उभर रहे हैं, बल्कि यह हकीकत इस बात से भी सामने आती है कि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने 10 जनवरी को रामलीला मैदान की रैली में उन्हें बीजेपी के सबसे प्रमुख प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से नवाजा। आम चुनावों में दिल्ली के 70 में से 60 विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपी को बढ़त मिली थी। हालात को पलटने के लिए केजरीवाल आप को उसकी एनजीओ/ एक्टिविस्ट जड़ों से परे ले जाकर एक मजबूत ढांचे वाली पार्टी में तब्दील कर रहे हैं।

केजरीवाल को क्या है फायदा
केजरीवाल ने मोदी के लोकसभा चुनाव प्रचार के भी एक गुर को हथिया लिया है। पार्टी के रणनीतिकारों का कहना है कि केजरीवाल ने रामलीला मैदान में मोदी की रैली से पहले ही दिल्ली में 50 विधानसभा-स्तर की जनसभाओं को संबोधित कर लिया था। केजरीवाल को एक यह भी फायदा हासिल है कि जहां मोदी सुरक्षा के तामझम के कारण सिर्फ बड़ी सभाएं कर सकते हैं, वहीं केजरीवाल गली-मुहल्ले में उपलब्ध हैं। आप के वरिष्ठ नेता ऐसी जनसभाओं को लगभग रोजाना संबोधित कर रहे हैं।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि उनका लक्ष्य मतदान के दिन तक हर विधानसभा क्षेत्र में 8-10 जनसभाएं कर लेने का है. आप के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘अन्य राज्यों में बीजेपी का सामना धूमिल छवि वाली तत्कालीन सरकारों से था और सामने कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं था, लेकिन दिल्ली में यह स्थिति नहीं है.’

आप की नई ढांचागत मजबूती के लिए स्वयंसेवी सहयोग और सोशल मीडिया में सक्रियता की भरपूर मदद ली जा रही है। आप के लिए अतीत में भी यह फायदेमंद रहा है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में प्रचार के लिए उन्हें देशभर से पांच से दस हजार कार्यकर्ताओं के दिल्ली में जुटने की उम्मीद है। यह संख्या में भले ही उससे कम हो जो 2013 के विधानसभा चुनावों के वक्त पार्टी ने जुटा लिए थे, लेकिन इस बार वे चुनावी प्रक्रिया से ज्यादा बेहतर वाकिफ होंगे। ये कार्यकर्ता पहले ही आप के सोशल मीडिया अभियान को जमकर हवा दे रहे हैं, ताकि एक माहौल कायम हो सके और साथ ही वे नुक्कड़ नाटकों और फ्लैश मॉब अभियान की भी पूरी मदद ले रहे हैं।

पार्टी ने बीजेपी को चकमा देते हुए समूची दिल्ली में खास नजर आने वाली 80 जगहों पर केजरीवाल के होर्डिंग तान दिए। इससे कम होर्डिंग के बावजूद आप की मौजूदगी बीजेपी जैसी दिख रही है। केजरीवाल ने पार्टी के चुनाव अभियान के लिए मुंबई, बेंगलूरू और दुबई में संसाधन जुटाने वाले बहु-प्रचारित कार्यक्रम आयोजित किए. लेकिन साथ ही विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर भी संसाधन जुटाने के कार्यक्रम चल रहे हैं। इस कोशिश से न केवल पैसा जुटेगा बल्कि उस मध्य वर्ग का समर्थन भी मिलेगा जिसके बारे में यह कहा जा रहा था कि वह आप से छिटक कर दूर चला गया है। केजरीवाल पहले ही ऐसे 13 कार्यक्रमों में शिरकत कर चुके हैं। हालांकि मध्य वर्ग को लेकर अनिश्चितता यकीनन पार्टी को थोड़ा परेशान किए हुए है लेकिन उसे यह उम्मीद भी है कि कांग्रेस के प्रति घटता उत्साह आप को मुसलमानों के भी ज्यादातर वोट दिला देगा।

पार्टी 2013 में उभरकर सामने आए कमजोर पहलुओं पर भी काम कर रही है, जैसे ग्रामीण बाहरी दिल्ली जहां उसने 12 में से केवल एक सीट पर जीत हासिल की थी। वह जनसभाएं आयोजित करके भूमि अधिग्रहण पर केंद्र सरकार के अध्यादेश का विरोध कर रही है। आप ने अपने 21 विधायकों को फिर से टिकट दिया है लेकिन बाकी सीटों पर वह उन लोगों पर मुख्य रूप से निर्भर है जिन्हें आम चुनावों के तुरंत बाद पार्टी संगठन खड़ा करने के लिए अलग-अलग विधानसभा क्षेत्र सौंपे गए थे। पार्टी ने 48 प्रत्याशी उन्हीं में से चुने हैं। इसके अलावा पार्टी ने चार कार्यकर्ताओं को भी टिकट दिए हैं।

केंद्रीय नियंत्रण
बीजेपी की दिल्ली इकाई इस बात को लेकर भ्रमित थी कि दिल्ली में जोड़-तोड़ से सरकार बनाई जाए या नहीं, वहीं बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन रहते दिल्ली के लिए कई सारे कदमों का ऐलान किया। बाकी लोगों के अलावा राजनाथ सिंह, एम. वेंकैया नायडू, नितिन गडकरी और पीयूष गोयल सरीखे केंद्रीय मंत्री भी दिल्ली के चुनावों पर निगाह रखते हुए राजधानी में शिलान्यास करते या गंभीर मुद्दों पर राय रखते नजर आए। जाहिर था कि बीजेपी की दिल्ली इकाई को केंद्रीय शहरी विकास मंत्री नायडू और ऊर्जा मंत्री गोयल का रामलीला मैदान की रैली को संबोधित करके दिल्ली के विकास के केंद्र में सरकार के योगदान को गिनाना उपयुक्त ही लगा।

इस बीच उपाध्याय की छवि को लगे तेज झटके के अगले ही दिन पार्टी में पूर्व आइपीएस किरण बेदी की पैराशूट लैंडिंग हो गई। अरुण जेटली और अमित शाह की मौजूदगी में वे पार्टी में आईं और उसी दिन मोदी से भी मिल लीं। उन्हें तुरंत मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर देखा जाने लगा। वैसे भी पिछली बार मुख्यमंत्री के रूप में उसका चेहरा हर्षवर्धन अब केंद्र में मंत्री हैं और विधानसभा चुनावों की दौड़ तक में शामिल नहीं हैं। स्मृति ईरानी, विजय गोयल, दिल्ली बीजेपी के प्रमुख सतीश उपाध्याय के बारे में भी चर्चा कर ली जाती है। लेकिन कुछ भी पुख्ता नहीं है। ऐसे में केजरीवाल अपने नाम और वादे निभाने को लेकर बनी पहचान के चलते रेस में आगे बने हुए हैं।


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