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गरीबों को सहारा देने वाले मनरेगा पर लटकी तलवार


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नई दिल्ली,(एजेंसी) 7 फरवरी । 2006 में मनरेगा का लागू होना गरीबों के लिए एक वरदान के समान था । इससे भारत के एक बड़े गरीब वर्ग को न सिर्फ 2 समय की रोटी का अधिकार मिला, बल्कि उनके जीवन स्तर में भी बेहतरी आई। 2006 में 200 पिछड़े जिलों में इसकी शुरुआत होने के महज 2 सालों के अंदर ही यह देश के सभी जिलों में लागू हो गया। गरीबों को रोजगार उपलब्ध कराने और जिंदगी की को एक नई दिशा देने के लिए इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा की गई, लेकिन अब इस पर तलवार लटक रही है।

मनरेगा देश की नीतियों में एक बुनियादी बदलाव का प्रतीक है। इस कानून के तहत भारत के ग्रामीण इलाकों में मजदूरों को 100 दिन के रोजगार को संवैधानिक अधिकार बनाया गया। इसके तहत किसी भी ग्रामीण को जरूरत पड़ने पर किसी लोक निर्माण परियोजना में काम दिया जा सकता है।

कई स्टडी से यह साफ हुआ है कि इस कानून से ग्रामीण मजदूरी और गरीबी पर सकारात्मक असर पड़ा, रोजगार के लिए पलायन रुका है, महिलाओं और एससी-एसटी का सशक्तीकरण हुआ है, ग्रामीण आधारभूत ढांचे का विकास हुआ है। इस कार्यक्रम की वजह से स्त्रियों और पुरुषों के न्यूनतम मजदूरी के अंतर में भी कमी आई है। महिलाओं को इसकी वजह से न्यूनतम मजदूरी पुरुषों के बराबर मिलने लगी है।

लेकिन, एक्सपर्ट्स के मुताबिक केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद इस योजना पर पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र में बीजेपी सरकार आने के बाद से मनरेगा कार्यक्रम के प्रदर्शन में गिरावट आई है।

इस कार्यक्रम के लिए सबसे बड़ी समस्या बकाया मजदूरी बनती जा रही है जो इस समय करीब 75 प्रतिशत हो चुकी है। इसलिए, अच्छे परिणामों के बावजूद मरनेगा का भविष्य अनिश्चित है। मौजूदा सरकार इसे लेकर कोई उत्साह नहीं दिखा रही है। संयोगवश योजना आयोग की जगह लेने वाले नीति आयोग में जिन 2 अर्थशास्त्रियों की नियुक्ति की गई वे दोनों ही सामाजिक सुरक्षा वाले अन्य कार्यक्रमों समेत मनरेगा के मुखर आलोचक रहे हैं।

मौजूदा सरकार मनरेगा को फिर से 200 जिलों तक सीमित करना चाहती है और इसके लिए सभी प्रदेशों (बीजेपी शासित समेत) को आवंटित की जाने वाली धनराशि में भी कटौती की गई है। सरकार ने कार्यक्रम के तहत मैटेरियल कम्पोनेंट का अनुपात भी बढ़ा दिया है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा ही मिलेगा।


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