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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती


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नई दिल्ली,(एजेंसी)12 फरवरी । दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी की जीत हुई है ये वो हकीकत जिसे देखकर कोई अभिभूत तो कोई हैरान।

ये उस संघर्ष की दास्तान है जिससे गुजरते हुए अरविंद केजरीवाल दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे हैं। ये उन मुश्किलों की कहानी है जो बार-बार कदमों को आगे बढ़ने से रोकती रहीं, लेकिन केजरीवाल थके नहीं, केजरीवाल कभी रुके नहीं। केजरीवाल को भरोसा था कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

पार्टी के दफ्तर की बालकनी में एक विजयी योद्धा की तरह खड़े होकर लोगों के साथ खुशी बांटने की अनुभूति कैसी होती है ये एहसास सिर्फ और सिर्फ केजरीवाल ही कर सकते हैं, क्योंकि कुछ पल ऐसे भी आए थे जब कई बार आगे बढ़ने का हर रास्ता बंद नजर आने लगता था।

14 फरवरी को अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे लेकिन 14 फरवरी 2015 की इस तारीख से जरा पांच साल पीछे चलिए जहां हम आपको केजरीवाल के आगे बढ़ने। बार-बार गिरने और फिर गिरकर संभलने की कहानी सुनाएंगे।

केजरीवाल के संघर्ष की ये कहानी साल 2010 से शुरू होती है जब इनकम टैक्स विभाग की नौकरी छोड़कर आया एक शख्स जनलोकपाल आंदोलन की जमीन तैयार करने में जुटा था।केजरीवाल किरन बेदी ये सब एक टीम बन चुके थे। 29 अक्टूबर 2010 को प्रेस क्लब में देश में सबसे बड़े आंदोलन की चिंगारी दिखाई दी थी। प्रेस कॉन्फ्रेंस का मकसद था कॉमनवेल्थ खेलों में हुए भ्रष्ट्राचार के खिलाफ कडी कार्रवाई की मांग करना।

ये प्रेस कॉन्फ्रेंस आंदोलन के लिए नींव का पत्थर साबित हुई। इस वक्त तक अरविंद केजरीवाल सिर्फ समाजसेवी के तौर पर मशहूर थे जिसने साल 2000 में एक एनजीओ परिवर्तन की शुरूआत की. और लंबे समय तक सूचना के अधिकार के लिए मुहिम भी चलाई थी।

ये सिलसिला आगे बढ़ा और बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे इंडिया अंगेस्ट करप्शन की मुहिम का हिस्सा बने। 5 अप्रैल 2011 को जंतर मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना ने अनशन की शुरुआत की। अन्ना आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा थे और अन्ना को चेहरा बनाने वाले थे केजरीवाल. पहले जंतर मंतर और फिर रामलीला मैदान में अन्ना का अनशन। देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़े आंदोलन के सूत्रधार थे केजरीवाल।

जनता ने पूरा समर्थन दिया, टीम अन्ना ने मुंबई के एमएमआरडीए मैदान में दिसंबर महीने में एक बार आंदोलन शुरू किया। अन्ना अनशन पर बैठे रहे लेकिन भीड़ नहीं जुटी कुर्सियां खाली रही और अनशन तोड़ना पड़ा। ये केजरीवाल को पहला झटका था।

देश केजरीवाल को पहचानने लगा था लेकिन जिस मकसद से ये लड़ाई शुरू हुई थी वो मकसद पूरा नहीं हो रहा था। यहां के बाद कहानी बदलने लगी थी, अब केजरीवाल ने खुद मोर्चा संभालने की तैयारी कर ली थी।

रामलीला मैदान के बाद जुलाई 2012 में जंतर मंतर पर एक बार फिर अनशन शुरू हुआ लेकिन इस बार अनशन करने वाले अन्ना हजारे नहीं बल्कि डायबिटीज के मरीज अरविंद केजरीवाल थे। करीब 10 दिन के अनशन के बाद इसी मंच से केजरीवाल ने राजनीति में जाने का फैसला सुनाया।

पहले तो अन्ना ने समर्थन दिया लेकिन धीरे-धीरे साफ हो गया कि टीम अन्ना का एक धड़ा केजरीवाल के राजनीति में जाने के सख्त खिलाफ है। अन्ना ने अपने नाम और तस्वीर का इस्तेमाल तक करने से मना कर दिया था।

केजरीवाल आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे राजनीति में उतरकर चीजें बदलना चाहते थे लेकिन उनकी सहयोगी किरन बेदी और अन्ना हजारे से उन्हें दूसरा झटका लगा।

अन्ना का साथ नहीं मिला लेकिन अन्ना से मौन आशीर्वाद के सहारे केजरीवाल आगे बढ़ गए। केजरीवाल को देश जान चुका था लेकिन सिर्फ जानने भर जनता वोट नहीं देगी ये उन्हें पता था केजरीवाल ने राजनीति के बड़े नामों पर हमला करना शुरू किया।

सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वार्डा पर जमीन घोटाला करने, नितिन गडकरी पर सिंचाई घोटाला करने, उद्योगपति मुकेश अंबानी के काम करने के तरीकों पर भी सवाल उठाए और एक के बाद एक हमलों के जरिए केजरीवाल ने राजनीति में अपनी दस्तक दे दी।

केजरीवाल नई तरह की राजनीति की शुरुआत कर रहे थे बिजली पानी जैसे मुद्दों को उठाया और दिल्ली की लगातार तीन बार सीएम रहीं शीला दीक्षित के खिलाफ नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ने का एलान किया।

तमाम कयासों को खारिज करते हुए अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में 28 सीटें हासिल की। किसी को अंदाजा नहीं था चंद महीनों पहले पैदा हुई एक पार्टी सरकार बनाने के करीब पहुंच चुकी थी कांग्रेस से समर्थन लेकर केजरीवाल ने दिल्ली में सरकार बनाई। सरकार तो बन गई लेकिन तमाम वादों पर केजरीवाल सरकार से हिसाब मांगा जाने लगा।

केजरीवाल ने सीएम रहते हुए धरना तक दिया। इस धरने ने भी केजरीवाल की छवि को नुकसान पहुंचाया और फिर 49 दिन की सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने लोकपाल बिल के मुद्दे पर सीएम पद से इस्तीफा दे दिया।

केजरीवाल लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के खिलाफ काशी की सीट से मैदान में उतर गए देश भर में आम आदमी पार्टी के 400 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा लेकिन यहां केजरीवाल को मुंह की खानी पड़ी, ना सिर्फ केजरीवाल हारे बल्कि तमाम उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

संजय सिंह बताते हैं कि 400 से ज्यादा सीटों पर लड़ी आप के नब्बे फीसदी से ज्यादा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई.. आप को जमानत जब्त पार्टी कहा जाने लगा, इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान केजरीवाल पर कई बार हमले भी हुए कभी स्याही फेंकी गई तो कभी थप्पड़ मारा गया।

केजरीवाल ने जहां से शुरुआत की थी वो वापस वहीं पर आ चुके थे। वो दोबारा दिल्ली चुनाव कराने की मांग करने लगे, लेकिन केजरीवाल को एहसास हो चुका था कि जो जमीन उन्होंने पिछले चुनाव में तैयार की थी वो खो चुकी है। केजरीवाल के सत्ता छोड़ने के फैसले से जनता नाराज थी।

आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने कहा कि जब लोगों से मिलने के लिए उनके घर जाते थे तो कई महिलाओं ने उनके मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया था। बगल से गुजरते लोग तंज कसने लगे थे कि केजरीवाल पीएम बनने का सपना देखने चले थे। केजरीवाल ने इस कड़वाहट को अपनी माफी से दूर करने का फैसला किया और गलती मान ली।

दिल्ली के लिए केजरीवाल ने अपनी रणनीति बदल ली थी पिछली बार नाम लेकर हमला करने वाले केजरीवाल इस बार सिर्फ दिल्ली के मुद्दों की बात कर रहे थे। केजरीवाल दिल्ली की जनता के सामने अपनी विनम्र छवि पेश कर रहे थे।

इधर बीजेपी ने केजरीवाल की काट के तौर पर किरन बेदी को बीजेपी का सीएम उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतार दिया, केजरीवाल को झटका लगा। टीम केजरीवाल ने किरन बेदी पर अवसरवादी होने के आरोप लगाए और डिबेट की चुनौती दी। केजरीवाल बनाम किरन बेदी की इस लड़ाई में वो एक बार ज्यादा मजबूत होकर उभरने लगे कि तभी आम आदमी पार्टी को मिले चंदे को लेकर केजरीवाल पारदर्शी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई।

इधर केजरीवाल पर एक के बाद एक तीखे हमले होने लगे, उनकी ईमानदारी से लेकर उनके तौर तरीकों तक। बीजेपी में पार्टी प्रवक्ता से लेकर प्रधानमंत्री तक ने केजरीवाल पर हमले किए। लेकिन इन तमाम हमलों के बावजूद केजरीवाल ने किसी का नाम लेकर हमला किया।

जवाब दिया भी तो विनम्र तरीके से, बीजेपी की निगेटिव कैंपेनिंग को भी केजरीवाल ने अपना हथियार बना लिया था, वो आगे बढ़ रहे थे अपनी आदर्शवादी सोच और संकल्प से ना डिगने की मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर, केजरीवाल बार-बार गिरते रहे लेकिन दोबारा जब भी उठते तो दोगुनी हिम्मत और जोश के साथ।

खुद केजरीवाल ने भी कल्पना नहीं की थी दिल्ली की 67 सीटों पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार जीतेंगे. जब जब देश में राजनीतिक उठापटक के इतिहास पर चर्चा होगी तब तब अरविंद केजरीवाल का नाम लिया जाएगा।

2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल ने ना सिर्फ राजनीति का नया अध्याय लिखा है बल्कि वो आम आदमी के सबसे बड़े हीरो बनकर उभरे हैं।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है ।

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,

जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है ।

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,

संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम ।

कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती !


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