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मूवी रिव्यू रॉय: समझ में नहीं आया कि ये फिल्म कैसे बन गई


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नई दिल्ली,(एजेंसी)14 फरवरी ।
रेटिंग: ** (दो स्टार)
बॉलीवुड में कुछ साल पहले फिल्मों के नाम के आगे एक टैग लाइन लगाने का ट्रेंड हुआ करता था जैसे दाग़- दि फ़ायर, जाल-दि-ट्रैप। ढाई घंटे की पकाऊ फिल्म रॉय झेलने के बाद लगा कि इसका पूरा नाम होना चाहिए ‘रॉय-कोई इस बोरियत से बचाए’। फिल्म में रणबीर कपूर के बावजूद ये फिल्म दर्शकों के सब्र का कड़ा इम्तेहान लेती है और अंत में कहीं भी नहीं पहुंचती।

रॉय कहानी है लेखक और फिल्म निर्देशक कबीर ग्रेवाल (अर्जुन रामपाल) की। फिल्म में रॉय के टायटिल रोल में रणबीर कपूर हैं, रॉय एक शातिर चोर है और जो आज तक पकड़ में नहीं आया है। कबीर रॉय की चोरियों पर आधारित थ्रिलर फिल्में बनाता है और करोड़ों कमाता है, लेकिन कबीर की ज़िंदगी में आयशा (जैकलीन) और रॉय की ज़िदगी में टिया (जैकलीन आती) है तो सबकुछ बदल जाता है। कहानियां आपस में उलझ जाती हैं, ना कबीर फिल्म बना पाता है, ना रॉय से चोरी होती है। एक थ्रिलर लगने वाली अच्छी-ख़ासी कहानी, बोझिल लव स्टोरी में बदल जाती है।

ऐसा नहीं है कि फिल्म में कुछ भी अच्छा नहीं है। फिल्म का स्टोरी आयडिया नया और दिलचस्प है। फिल्म बेहद खूबसूरती से शूट की गई है। इसका गीत-संगीत भी बहुत अच्छा है, लेकिन फिल्म को जोड़े रखने वाली स्क्रिप्ट नदारद है, फिल्म इतनी धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ती है कि थिएटर में बैठना मुश्किल हो जाता है। निर्देशक विक्रमजीत सिंह फिल्म की मज़बूत शुरुआत तो करते हैं लेकिन फिर ये फिल्म बिखर जाती है।
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फिल्म का सस्पेंस इंटरवल तक ही ज़ाहिर हो जाता है। इसके बाद बस यही लगता है कि फिल्म ख़त्म क्यों नहीं हो रही। एक सीन में फिल्म निर्देशक बनी आयशा (जैकलीन) कहती है- अगर कहानी सही दिशा में ना जा रही है, तो उसे खत्म कर देना चाहिए। बेकार में खींचने का कोई फ़ायदा नहीं होता, रॉय पर ये डायलॉग पूरी तरह लागू होता है।

अर्जुन रामपाल अपने रोल में बहुत अच्छे लगे हैं। काश स्क्रिप्ट ने उनका साथ दिया होता। जैकलीन फर्नान्डेस ने दो रोल निभाए हैं और दोनों रोल में वो एक सी ही लगी हैं। फिल्म में सबसे ज़्यादा कन्फ़्यूज़्ड लगे हैं रणबीर कपूर। वो किसी रोबोट की तरह अपने हर सीन में अभिनय करते हैं। ऐसा लगता है जैसे उन्हें इस फिल्म में ज़रा भी दलिचस्पी नहीं थी और उनसे ज़बरदस्ती कैमरा के सामने खड़े होने को कहा गया हो, ना तो वो फिल्म में मेहमान कलाकार हैं, ना ही उनका पूरा रोल है। ये कुछ बीच का है जो बिलकुल समझ में नहीं आता।
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क्लाईमैक्स में जब कबीर ग्रेवाल (अर्जन रामपाल) की फिल्म बनकर रिलीज़ होती है तो वो कहता है- समझ में नहीं आया कि ये फिल्म कैसे बन गई? ये फिल्म रॉय का अकेला डायलॉग है जिसमें दर्शक हंसे और थिएटर के अंदर सबसे ज़्यादा तालियां बजीं। ये एक लाइन का डायलॉग रॉय को पूरी तरह बयां करता है।


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