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बिहार जैसे कुछ राज्यों के बारे में है चिंता: सेन


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नई दिल्ली,(एजेंसी) 26 फरवरी । बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने केंद्रीय करों में से 42% हिस्सा राज्यों को दिए जाने की 14वें वित्त आयोग की सिफारिश मंजूर कर ली है। इससे पहले यह लिमिट 32% थी। हालांकि वित्त आयोग के सदस्य अभिजीत सेन का कहना है कि यह कदम आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों को दिक्कत दे सकता है, जो सामाजिक सेक्टर की योजनाओं को लागू करने के लिए केंद्रीय सहायता पर काफी निर्भर रहते हैं क्योंकि इनके लिए एलोकेशन पर कैंची चल सकती है। योजना आयोग के सदस्य रहे सेन ने ईटी की योगिमा सेठ को दिए इंटरव्यू में कहा कि इतने कम वक्त में फंडिंग पैटर्न में इस बदलाव से कुछ राज्यों को बड़ा झटका लगेगा। सेन ने केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी 38% तक रखने का सुझाव दिया था।
पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश:
क्या आपको लगता है कि राज्यों को टैक्सेज के मद में ज्यादा फंड देने से उनके डिवेलपमेंट एजेंडा पर असर पड़ेगा?
सरकार के पास ज्यादा पैसे नहीं हैं। सेंट्रल फंड्स में से राज्यों को मिलने वाली रकम 10% बढ़ती है तो कहीं और कटौती करनी होगी। विभिन्न राज्यों के लिए इसका क्या असर होगा, यह बात आम बजट में साफ होगी।

क्या सभी राज्यों में इतना दम है कि फंडिंग पैटर्न में केंद्र की ओर से प्रस्तावित बदलाव पहली अप्रैल से लागू होने पर वे सोशल सेक्टर के प्रोग्राम्स को लागू कर पाएं?

अगर हम अपनी नजर सेंट्रल टैक्सेज के इस हिस्से पर ही सीमित रखें तो निश्चित रूप से राज्यों को केंद्र से ज्यादा रकम मिलेगी, लेकिन असल दिक्कत दूसरे मदों के तहत फंड्स के ट्रांसफर में होगी। अगर गरीब राज्यों को दूसरी केंद्रीय सहायताओं में कटौती होती है तो उनमें से कुछ को तगड़ा झटका लगेगा और उन्हें इसे बर्दाश्त करने में मुश्किल होगी।
राज्यों के स्तर पर फाइनेंशियल मैनेजमेंट में इसका कैसे असर पड़ेगा?

सेंट्रल टैक्सेज से राज्यों को मिलने वाले हिस्से में 10% का इजाफा केंद्र से राज्यों को सभी करेंट प्लान ट्रांसफर्स का करीब एक तिहाई है। इन ट्रांसफर्स में होने वाली कटौती को विभिन्न प्लान स्कीम्स में बांटना होगा और बहुत कम वक्त के नोटिस पर ग्रांट्स ब्लॉक होंगी। चूंकि राज्य आमतौर पर मानते रहे हैं कि वित्त आयोग के सुझाए कदमों के कारण केंद्र से राज्यों को मिलने वाली रकम अप्रभावित रहेगी, लिहाजा ऐसी रकम में कोई भी कटौती राज्यों की वित्तीय क्षमता का इम्तहान होगी।

यह तय करने में किसी राज्य का गवर्नेंस मॉडल कितना अहम होगा कि उसका डिवेलपमेंट एजेंडा नेशनल एजेंडा के मुताबिक है?

यह बात सही है कि मैं बिहार जैसे कुछ राज्यों और स्पेशल कैटेगरी वाले राज्यों के बारे में चिंतित हूं, जिन्हें दूसरी मदों में बड़ा सेंट्रल फंड मिलता है। इसकी वजह यह है कि केंद्र ने तो केंद्रीय करों में से राज्यों को ज्यादा हिस्सा देने पर ही सहमति जताई है, लेकिन वित्त आयोग की दूसरी सिफारिशों पर अभी उसने फैसला नहीं किया है। इनमें रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट सरीखी बाते हैं। इसके अलावा इन राज्यों को अपने कैपिटल एक्सपेंडिचर का खुद खयाल रखना होगा क्योंकि इसकी भरपाई रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट से नहीं हो सकती है।


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