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विश्व महिला दिवस 2015 : संघर्षों की ऊंची उड़ान


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नई दिल्ली,(एजेंसी) 08 मार्च । आज हम सलाम करते हैं दुनिया भर की उन सभी महिलाओं को, जो कड़े संघर्षों के बावजूद हिम्मत नहीं हारतीं। सलाम है उन महिलाओं को, जिन्होंने हर तरह के शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद की। वे महिलाएं, जो मानती हैं कि जीवन को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी उनकी भी है। पेश हैं ऐसी ही कुछ जानी-अनजानी नायिकाओं के संघर्ष की कहानी।

पैर खोया पर हिम्मत नहीं खोई
रेबेका ग्रेगरी, अमेरिका
वर्ष 2013 में अमेरिका में बोस्टन मैराथन के दौरान बम विस्फोट में घायल हुई रेबेका बच तो गयीं, पर अपना पैर नहीं बचा सकीं। 15 से अधिक ऑपरेशन के बाद भी फायदा न होने पर उन्होंने अपने पैर को कटवाने का निर्णय लिया और अब वे कृत्रिम पैर के सहारे मैराथन में भाग लेने की तैयारी कर रही हैं। वह अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ दौड़ देखने गयी थीं। बम विस्फोट में उनके पैर के घुटने के नीचे की हड्डियां टूट गयी थीं। दूसरे पैर में भी काफी चोट आयी थी। उल्टे पैर को ठीक करने की प्रक्रिया में समय बीत रहा था। उन्हें लगा कि इसके कारण वे जीवन में आगे नहीं बढ़ पा रही हैं। उन्होंने अपने नकली पैर को फेलिशिया नाम दिया है। अपनी मजबूत इच्छाशक्ति की बदौलत उनमें तेजी से सुधार होने लगा। इससे पहले कभी दौड़ने के बारे में न सोचने वाली रेबेका अब मैराथन में शामिल होंगी। रेबेका ने फेसबुक पर अपना एक पेज भी बनाया है, जिसमें वह अपनी शादी से लेकर अपनी तैयारियों की फोटो शेयर करती हैं।

अनोखी टैक्सी ड्राइवर
सारा बहई, अफगानिस्तान
चालीस वर्षीय सारा बहई पिछले दस वर्षों से मजार-ए-शरीफ शहर में टैक्सी चला रही हैं। पिछली सीट पर बैठे पुरुष यात्रियों की नाखुशी देखकर वह उनसे महिला अधिकारों की बात करने का मौका नहीं छोड़तीं। सारा एक ऐसी दुनिया में जन्मी थीं जहां हर स्तर पर महिलाओं की आजादी का हनन किया जाता था, पर सारा ने आत्मनिर्भर बनने का मार्ग चुना था। 2002 में तालिबान का अंत होते ही उन्होंने प्रोफेशनल ड्राइविंग कोर्स में दाखिला लिया। आज वह अपनी मां, दो गोद लिए बच्चों व बहन के परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। वह कहती हैं मैंने शादी इसलिए नहीं की कि घर में कोई कमाऊ सदस्य नहीं था।

जीवन के पक्ष में अभियान
बैट्टी मैकोनी, जिंबाब्वे
जीवन में एक ऐसा समय आता है, जब मन कह उठता है कि बस अब और नहीं। बैट्टी मैकोनी ने भी ऐसे ही क्षणों में दिल को मजबूत कर यह फैसला किया कि अब वे महिलाओं को यौन शोषण का शिकार नहीं होने देंगी। बैट्टी मैकोनी की कहानी पीड़िता से सामाजिक कार्यकर्ता बनने की है। छह साल की उम्र में बैट्टी का बलात्कार ऐसे व्यक्ति ने किया था, जिसका मानना था कि कुंआरी कन्या से यौन संबंध बनाना भाग्य में वृद्धि करता है।

इसके बाद बैट्टी ने न सिर्फ अपने शारीरिक और मानसिक दर्द को सहा, बल्कि अपने समान गरीबी और हिंसक परिवेश में यौन शोषण झेल रही लड़कियों व महिलाओं को दर्द से बाहर निकालने की ठानी। पिता द्वारा मां की हत्या कर देने के बाद उन्होंने उस परिवेश से नाता तोड़ लिया। नौ साल की उम्र में अनाथ हो चुकी बैट्टी ने पहली लड़ाई स्कूल में दाखिले के लिए की। यूनिवर्सिटी की शिक्षा पूरी करने के बाद वह शिक्षिका बनीं, जहां उन्हें पता चला कि बड़ी संख्या में लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। उन्होंने एक क्लब बनाया, जहां लड़कियां व महिलाएं खुलकर बात कर सकती थीं। उनकी मदद से जिंबाब्वे के सभी स्कूलों में यह प्रोग्राम चलाया गया, जिसे आगे चलकर ‘गर्ल चाइल्ड नेटवर्क’ का नाम मिला।

यौन तस्करी के खिलाफ
डॉ. सुनीता कृष्णन, बेंग्लुरू
आमतौर पर गेंग रेप की शिकार महिलाएं जिंदा ही नहीं बचतीं और जो बच जाती हैं, वे अपना जीवन घृणा व अविश्वास के माहौल में गुजारती हैं। डॉ. सुनीता कृष्णन, जो यौन तस्करी के खिलाफ मुहिम चला रही हैं, आज देश-विदेश में रह रहे लोगों के लिए बड़ी प्रेरणा हैं। वह आठ साल की उम्र से ही अपने गांव के गरीब व मानसिक रूप से अक्षम बच्चों के लिए काम करने लगी थीं। वे उन्हें डांस सिखाती थीं। 12 वर्ष की उम्र में वे वंचित बच्चों के लिए अपने स्तर पर एक स्कूल भी चलाती थीं। इसी मुहिम के दौरान एक गांव के लोगों को समझाने पहुंची सुनीता दुष्कर्म की शिकार हुई थीं।

उन्होंने बेंग्लुरू के सेंट जोसेफ कॉलेज से पर्यावरण विज्ञान में पढ़ाई की, सोशल वर्क में मास्टर्स डिग्री और पीएचडी भी की। डॉ. सुनीता कृष्णन हैदराबाद में स्वयं सेवी संगठन प्रज्वला की पूर्णकालिक सदस्य व सहसंस्थापक हैं। अपनी इस संस्था के जरिए वे यौन शोषण व यौन तस्करी का शिकार हो रही महिलाओं और बच्चों को बचाने व उनको मुख्यधारा से जोडम्ने का काम करती हैं। हाल में सुनीता ‘शेम-द रेपिस्ट’ अभियान के लिए चर्चा में रहीं, जिसमें उन्होंने तमाम सोशल मंचों पर दो यौन अपराधियों की फोटो को अपलोड कर लोगों से उन्हें पहचानने के लिए अपील की थी।

शारीरिक बाधाओं से आगे
जेनिफर ब्रिकर, अमेरिका
जन्म के समय से ही जेनिफर के दोनों पैर नहीं थे, पर आज वे जिमनास्ट भी हैं और एक्रोबेट भी। वे उदाहरण हैं कि मजबूत इरादा और इच्छाशक्ति मनुष्य को किसी भी हालात से लड़ना सिखा देती है। यही वजह है कि हवा में किए जाने वाले उनके करतब और नृत्य लोगों को हैरान कर देते हैं। 1987 में जन्मी जेनिफर को माता-पिता ने निचला हिस्सा नहीं होने व गरीबी के कारण सही देखभाल नहीं कर पाने की मजबूरी में छोड़ दिया था।

जिन्होंने उसे गोद लिया, वहां उसकी परवरिश में कोई कसर नहीं रही। सात साल की उम्र के बाद जेनिफर ने बॉल से खेलना शुरू किया। पॉवर टंबलिंग खेल में वह कई अवॉर्ड जीत चुकी है। उन्होंने जूनियर ओलंपिक (1998) में भी भाग लिया, जहां पॉवर टंबलिंग में वे चौथे स्थान पर रहीं। बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे फ्लोरिडा डिजनी वर्ल्ड में काम करने के लिए गयीं, तो ब्रिटनी स्पीयर्स से मिलने का मौका मिला। उन्होंने विदेश टूर पर अपने साथ प्रदर्शन करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया। मनोरंजन उद्योग में कदम रखने के लिए सबसे पहले जेनिफर ने पहले अपना वजन कम किया और अपनी फिटनेस पर ध्यान देने लगीं। उन्हें कई मंचों पर भाषणों के लिए बुलाया जाता है।

कैदियों के बच्चों की ममू
पुष्पा बस्नेत, नेपाल
काठमांडू में रहने वाली 30 वर्षीय पुष्पा बस्नेत एक या दो बच्चों की नहीं, करीब 60 से अधिक बच्चों की देखभाल कर रही हैं। अधिकतर बच्चे अपनी माता या पिता के जेल में बंद होने के कारण वहीं रहने को मजबूर थे। नेपाल के एक प्रसिद्ध उद्यमी की बेटी पुष्पा को काठमांडू के सेंट जेवियर्स कॉलेज से सोशल वर्क में स्नातक करने के दौरान जेल को अंदर से देखने का मौका मिला था। तभी से पुष्पा ने फैसला किया था कि वह इन बच्चों की बेहतरी के लिए कार्य करेंगी। यह काम आसान नहीं था। संस्था तो बन गई, पर प्रशासन व बच्चों की मांओं से बच्चों को बाहर रहने देने के लिए अनुमति मिलना आसान नहीं था।

नेपाल के दूर-दराज इलाकों में बनी जेलों में जाकर वे मांओं और प्रशासन से मिलीं। शुरुआत डे-केयर प्रोगाम से की। बच्चे सुबह जेल से बाहर आ जाते थे, पढ़ने व खेलने के बाद रात में वापस मांओं के पास चले जाते। धीरे-धीरे सबको विश्वास होने लगा कि यही उनके बच्चों के लिए सही है। अपने इस अनोखे काम के लिए 2012 में पुष्पा को सीएनएन का हीरो पुरस्कार मिला, जिसकी 250000 डॉलर्स की राशि को उन्होंने गैर सरकारी संस्था अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट सेंटर के जरिए सामाजिक कार्यों में खर्च किया। वे जेल में बच्चों के अभिभावकों को भी हैंडीक्राफ्ट का प्रशिक्षण देने का काम शुरू कर चुकी हैं।

दलित महिला का संघर्ष
कल्पना सरोज, मुंबई
दलित परिवार में जन्मी कल्पना जब मुंबई आयीं तो उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि एक दिन उनकी कंपनी के नाम की ही मुंबई में दो सड़कें होंगी। 12 वर्ष की उम्र में कल्पना की शादी मुंबई में झुग्गी में रहने वाले एक व्यक्ति से हुई थी, पर बुरे बर्ताव से तंग आकर एक वर्ष पूरा होने से पहले ही घर लौट आईं। इसके बाद 16 की उम्र में एक बार फिर कल्पना मुंबई आईं। अपने अंकल के घर रहते हुए एक कपड़े की फैक्टरी में एक दिन के दो रुपये के मेहनताने पर काम करना शुरू किया। दलितों को मिलने वाले सरकारी ऋण की मदद से अपना बुटीक खोला, जो उद्यमी बनने की दिशा में उनका पहला कदम साबित हुआ।

कल्पना ने दोबारा शादी की, पर 1989 में पति की मृत्यु हो गयी। दो बच्चे भी थे। हार न मानते हुए पति के ही घाटे में चल रहे अलमारी बनाने के काम को संभाला। कड़ी मेहनत की बदौलत व्यवसाय पटरी पर आया। उससे हुए मुनाफे से कल्पना ने चीनी व स्टील मिलें खरीदीं। तमाम धमकियों के बावजूद कल्पना ने जमीन खरीदी और रियल एस्टेट क्षेत्र में कदम रखा। वे राजीव गांधी अवॉर्ड से भी सम्मानित की जा चुकी हैं। 500 करोड़ रुपये से अधिक की कंपनी की मालकिन होते हुए भी आज कल्पना अपने गांव जाती हैं। वहां पढ़ाई करने वाले बच्चों को लाइब्रेरी, हॉस्टल व अन्य वित्तीय सहायता देती हैं।

पेड़ों की अथक सेविका
सालूमरदा थिमक्का, कर्नाटक
कर्नाटक में रहने वाली सालूमरदा अपने अनोखे अंदाज में प्रकृति की सेवा कर रही हैं। हाइवे के चार किलोमीटर के मार्ग पर वे अब तक 384 बरगद के पेड़ लगा चुकी हैं। इन पेड़ों की देखभाल अब कर्नाटक सरकार कर रही है। थिमक्का को इस काम के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। लॉस एंजिल्स, ऑकलैंड व कैलिफोर्निया में काम कर रही अमेरिकी पर्यावरण संस्था का काम थिमक्कास रिसोर्स फॉर एन्वायर्नमेंट एजुकेशन उनके नाम पर ही रखा गया है। खास बात यह है कि उन्होंने औपचारिक शिक्षा हासिल नहीं की और मजदूरी करती हैं। शादी के बाद संतान नहीं होने पर दुख से बाहर आने के लिए उन्होंने पेड़ लगाने का फैसला किया।

थिमक्का के गांव में बरगद के काफी पेड़ थे, पर पास का गांव काफी गर्म रहता था। उस गांव के साथ वाली सड़क पर पेड़ लगाने के लिए थिमक्का ने अपने गांव में से छोटे पौधे एकत्र करने शुरू किए। इस काम में उनके पति ने भी सहयोग दिया। संसाधन कम होने के बावजूद वे दोनों बर्तनों में पानी भरकर छोटे-छोटे पौधों को देने के लिए जाते थे। पशुओं से उन्हें बचाने के लिए उनकी निगरानी करते थे। खास बात यह है कि 1990 में पति की मृत्यु के बाद आज 100 वर्ष से अधिक की उम्र में भी थिमक्का अपना यह काम कर रही हैं।


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