Sunday , 16 December 2018
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साकार होता देश का हर घर रोशन करने का सपना


जिस देश में योजनाएं अपनी लेटलतीफी के कारण कुख्यात रही हों और जहां तमाम कारणों से सरकारी कामकाज में देरी का रिकॉर्ड रहा हो वहां निर्धारित समय से पहले यदि कोई योजना पूरी हो जाए तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं कहा जाएगा। 15 अगस्त, 2015 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक हजार दिनों के भीतर देश के सभी गांवों तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। राजनीतिक इच्छाशक्ति और नौकरशाही की चुस्ती के कारण यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य 988 दिन में ही पूरा हो गया यानी तय समय से 12 दिन पहले, लेकिन इस उपलब्धि में एक खामी यह छिपी है कि विद्युतीकृत गांवों में एक बड़ी संख्या ऐसे घरों की रही जो अभी भी अंधेरे में डूबे हैं। ऐसे घरों की तादाद लाख दो लाख न होकर साढ़े चार करोड़ है।

इसे देखते हुए देश के हर घर को रोशन करने का भारी-भरकम लक्ष्य हर गांव तक बिजली पहुंचाने के लक्ष्य से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितंबर, 2017 को प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना यानी सौभाग्य जैसी मुहिम का आगाज किया। बिजली सुविधा से वंचित साढ़े चार करोड़ घरों तक बिजली पहुंचाने केलिए प्रधानमंत्री ने मार्च 2019 का समय तय किया था, लेकिन विद्युत मंत्रालय इस लक्ष्य को 31 दिसंबर, 2018 तक ही हासिल करने में जुटा है। सौभाग्य योजना के तहत ग्रामीण इलाकों के बिजली सुविधा से वंचित सभी परिवारों को और शहरी इलाकों के गरीब परिवारों को नि:शुल्क बिजली कनेक्शन मुहैया कराया जा रहा है। जो गांव परंपरागत ग्रिड सिस्टम से नहीं जुड़े हैं वहां सोलर फोटो वोल्टाइक सिस्टम यानी सौर ऊर्जा वाली तकनीक से जुड़े उपकरण बांटे जा रहे हैं जिससे पांच एलईडी बल्ब और एक पंखा चलाया जा सके। इस योजना के तहत विशेष कैंप लगाकर बिजली के कनेक्शन बांटे जा रहे हैं। 19 नवंबर, 2018 तक दो करोड़ घरों में बिजली पहुंचा भी दी गई है। मौजूदा समय में हर रोज हजारों घरों को बिजली का कनेक्शन दिया जा रहा है।

बिजली सुविधा से वंचित घरों तक जिस रफ्तार से हर रोज बिजली पहुंचाई जा रही है वह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस रफ्तार से 31 दिसंबर, 2018 तक सभी घरों को रोशन करना फिलहाल कठिन दिख रहा है। इसमें मुख्य चुनौती पांच राज्यों की ओर से आ रही है। ये राज्य हैं उत्तर प्रदेश, झारखंड, असम, ओडिशा और राजस्थान। इन सूबों के अंधेरे में डूबे लाखों घरों को रोशन करना आसान काम नहीं है। अकेले उत्तर प्रदेश में 65 लाख घरों तक बिजली पहुंचाना बाकी है। यहां हर रोज 12,613 घरों को कनेक्शन दिया जा रहा है जबकि दिसंबर तक सभी घरों को रोशन करने के लिए रोजाना 1.17 लाख घरों को कनेक्शन देना होगा। उत्तर प्रदेश में 35 लाख अवैध कनेक्शन एक बड़ी बाधा बने हुए हैं। इनमें से 20 लाख कनेक्शन नियमित किए जा चुके हैैं। असम, ओडिशा, झारखंड और राजस्थान में भी काम लक्ष्य से पीछे चल रहे हैं। इन राज्यों में 10 फीसद घर अभी भी अंधेरे में डूबे हैं। ओडिशा में अभी हाल की भारी बारिश और चक्रवात ने विद्युतीकरण की राह धीमी कर दी तो राजस्थान में भौगोलिक दूरी एक समस्या बनी हुई है। राजस्थान सरकार दूरदराज में बसे 3.56 लाख घरों को ऑफ ग्रिड तकनीक से रोशन करने की कवायद में जुटी है।

वल्र्ड एनर्जी आउटलुक के मुताबिक वर्ष 2017 में दुनिया में 12 करोड़ लोगों को पहली बार बिजली सुविधा मिली। यह अब तक की रिकॉर्ड संख्या है। इसका नतीजा यह हुआ कि बिजली की सुविधा से वंचित लोगों की तादाद 2018 में घटकर एक अरब से नीचे पहुंच गई। दुनिया ने यह उपलब्धि पहली बार हासिल की है और इसमें एक बड़ा योगदान भारत का रहा जहां देश के सभी गांवों तक रिकॉर्ड समय में बिजली पहुंचाई गई। इस साल के आखिर तक जब भारत के बिजली विहीन करोड़ों घरों को रोशन कर दिया जाएगा तब बिजली सुविधा से वंचित लोगों की तादाद में और अधिक कमी दर्ज की जाएगी।

मोदी सरकार की रीति-नीति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि वह बिजली की खपत और आर्थिक विकास के अंतर्संबधों से अच्छी तरह परिचित है। गौरतलब है कि जहां बिजली की खपत ज्यादा है वहां गरीबी आखिरी सांसें गिन रही है। दूसरी ओर जो इलाके बिजली खपत में पीछे हैं वहां गरीबी-बेकारी का घटाटोप अंधियारा छाया हुआ है। उदाहरण के लिए जहां भारत में सालाना प्रति व्यक्ति बिजली खपत 1122 किलोवाट घंटा है वहीं चीन में यह 4475 किलोवाट घंटा है। विश्व औसत की बात करें तो यह आंकड़ा 2674 किलोवाट घंटा है। स्पष्ट है कि मोदी सरकार बिजली खपत को आर्थिक विकास का इंजन मानकर चल रही है। यह भी जाहिर है कि उसे इसका भी भान है कि बिजली की कमी से मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे अभियान नाकाम ही रहेंगे।

हर घर तक बिजली पहुंचाने के बाद मोदी सरकार का अगला लक्ष्य देश के सभी घरों को सातों दिन-चौबीसों घंटे रोशन करने का है। इसके साथ ही सरकार ने 2030 तक प्रति व्यक्ति सालाना बिजली खपत को मौजूदा 1122 से बढ़ाकर 4000 किलोवाट घंटा करने का लक्ष्य रखा है। ये महत्वाकांक्षी लक्ष्य तभी पूरे होंगे जब बिजली उत्पादन में भरपूर बढ़ोतरी हो और बिजली वितरण तंत्र को आधुनिक बनाया जाए। मोदी सरकार इस दिशा में भी काम कर रही है।

पिछले चार वर्षों में बिजली की स्थापित क्षमता में एक लाख मेगावाट की बढ़ोतरी हुई है। इसी का नतीजा है कि मांग और आपूर्ति में 4.2 फीसद का अंतर घटकर महज 0.7 फीसद रह गया। इतना ही नहीं देश पहली बार बिजली का निर्यातक भी बना। सबसे उल्लेखनीय प्रगति अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में हुई है। पिछले चार वर्षों में अक्षय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 34000 से बढ़कर 72000 मेगावाट तक पहुंच गई। उत्पादन के साथ-साथ सरकार दक्षता बढ़ाकर खपत में भी कमी कर रही है। स्पष्ट है कि सातों दिन-चौबीसों घंटे बिजली मुहैया कराने का लक्ष्य एक ऐसा लक्ष्य है जिसे हासिल करने को लेकर आश्वस्त हुआ जा सकता है।


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