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मूवी रिव्यू : स्क्रीन से नजरे नहीं हटाने देती ‘NH10’


नई दिल्ली,(एजेंसी) 13 मार्च । समीक्षक: यासीर उस्मान, सीनीयर प्रोड्यूसर

रेटिंग: 4 स्टार
NH10
फिल्म ‘एनएच 10′ की कहानी के एक सिरे पर बड़े-बड़े अपॉर्टमेंट्स और आलीशन मॉल्स वाला गुड़गांव है तो दूसरी तरफ बस कुछ ही दूरी पर बसे वो गांव जो सालों से शहर बनने का सपना संजोए हैं। एक तरह से पड़ोस में दो अलग भारत बसते हैं जिन्हें जोड़ता है नैशनल हाईवे 10। निर्देशक नवदीप सिंह ‘एनएच 10′ इन दो अलग भारत में रहने वाले किरदारों और उनकी सोच के टकराव की कहानी है। ये एक ज़बरदस्त थ्रिलर है जो एक तरफ़ आपको स्क्रीन से नज़र तक हटाने नहीं देती और दूसरी तरफ़ आपको डराती है और सोचने पर मजबूर करती है।

मीरा (अनुष्का शर्मा) और अर्जुन (नील भूपलम) पति-पत्नी हैं जो गुड़गांव में रहते हैं और बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों में नौकरी करते हैं। एक रात किसी ज़रूरी काम के लिए ऑफिस जा रही मीरा पर सड़क पर कुछ लोग हमला करते हैं। किसी तरह वो बच निकलती है। बुरी तरह घबराए पति-पत्नी अगली सुबह पुलिस स्टेशन जाते हैं लेकिन पुलिसवाला उनसे कहता है कि ‘ये शहर बढ़ता बच्चा है, कूद तो लगाएगा ही’।

ये हादसा भुलाने के लिए अर्जुन और मीरा छुट्टी पर जाने का फैसला करते हैं। एनएच10 पर सफ़र के दौरान वो एक ढाबे में रुकते हैं। यहां एक शख़्स सतबीर (दर्शन कुमार) सरेआम घर से भागी अपनी बहन की पिटाई कर रहा है क्योंकि वो अपनी मर्ज़ी से शादी करना चाहती है। अर्जुन उसे रोकने की कोशिश करता है और मीरा के रोकने के बावजूद इस झगड़े में शामिल हो जाता है। लेकिन जल्द ही अंदाज़ा हो जाता है कि ये अर्जुन और मीरा की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ग़लती है, फिर होती है ख़ून-ख़राबे और किसी भी तरह जान बचाने की कोशिश। इस लड़ाई में मीरा का सामना इस सच से भी होता है कि समाज में कई जुर्म ऐसे हैं जिन्हें क़ानून रोकना ही नहीं चाहता।

यूं तो फिल्म की कहानी सीधी है और एक थ्रिलर के तौर पर ये पूरा मनोरंजन करती है लेकिन साथ ही कई बड़े मुद्दों की तरफ भी ये बड़े सशक्त तरीक़े से प्रहार करती है। ये बात एनएच10 को एक आम क्राइम थ्रिलर से अलग करती है। सुदीप शर्मा के कई डायलॉग बहुत असरदार है। ख़ासतौर से अपनी जान बचाने की गुहार लगाने आई मीरा को पुलिस अफ़सर समझाता है- “यहां बिजली पानी तो पहुंचा नहीं, कॉन्स्टीट्यूशन क्या खाक पहुंचेगा” या फिर जब वो मीरा से उसकी caste पूछते हुए कहता है- “आपकी डेमोक्रेसी न, गुड़गांव के आखिरी मॉल के बाद खत्म हो जाती है।”

निर्देशक नवदीप सिंह ने अपने निर्देशन से एनएच10 को ख़ास बना दिया है हालांकि फिल्म में कई घटनाएं ऐसी हैं जो सिर्फ फिल्मी ही कही जा सकती है, लेकिन स्क्रिप्ट की इन खामियों को फिल्म की तेज़ रफ़्तार छुपा लेती है। फिल्म के क्लाईमैक्स में नयापन बिलकुल नहीं हैं लेकिन ये शायद कमर्शियल मजबूरी थी और दर्शकों की तालियों के लिए जरूरी भी।
NH10-Movie

ये फिल्म पूरी तरह अनुष्का शर्मा के नाम है. मीरा के रोल में उन्होंने कई सीन में जान फूंक दी है। ख़ासतौर पर जब विलेन्स से जान बचाकर भागती हुई, पहाड़ पर चढ़कर वो चीख़ती हैं। बस फिल्म के आख़िरी सीन में वो किसी हिंदी मसाला फिल्म की हीरोइन बन जाती हैं लेकिन फिल्म की प्रोड्यूसर होने के नाते शायद वो जानती थी कि ऐसा करना ज़रूरी है। एक प्रोड्यूसर के तौर पर उन्होंने बेहद बोल्ड फिल्म बनाई है। नील ने भी अपना रोल बख़ूबी निभाया है।सतबीर के रोल में दर्शन कुमार को डायलॉग ज़्यादा नहीं मिले हैं लेकिन वो आंखों और खामोश चेहरे से सब ज़ाहिर कर गए हैं। फिल्म में उनका ख़ौफ़ साफ़ नज़र आता है।

फिल्म होते हुए भी एनएच 10 सच्चाई के बेहद क़रीब है, मनोरंजन भी करती है और आपको सीट से उठने तक नहीं देती। एक फिल्म से आपको और क्या चाहिए?

यूं तो फिल्म की कहानी सीधी है और एक थ्रिलर के तौर पर ये पूरा मनोरंजन करती है लेकिन साथ ही कई बड़े मुद्दों की तरफ भी ये बड़े सशक्त तरीक़े से प्रहार करती है। ये बात एनएच10 को एक आम क्राइम थ्रिलर से अलग करती है। सुदीप शर्मा के कई डायलॉग बहुत असरदार है। ख़ासतौर से अपनी जान बचाने की गुहार लगाने आई मीरा को पुलिस अफ़सर समझाता है- “यहां बिजली पानी तो पहुंचा नहीं, कॉन्स्टीट्यूशन क्या खाक पहुंचेगा” या फिर जब वो मीरा से उसकी caste पूछते हुए कहता है- “आपकी डेमोक्रेसी न, गुड़गांव के आखिरी मॉल के बाद खत्म हो जाती है।”
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निर्देशक नवदीप सिंह ने अपने निर्देशन से एनएच10 को ख़ास बना दिया है। हालांकि फिल्म में कई घटनाएं ऐसी हैं जो सिर्फ फिल्मी ही कही जा कती है, लेकिन स्क्रिप्ट की इन खामियों को फिल्म की तेज़ रफ़्तार छुपा लेती है। फिल्म का क्लाईमैक्स में नयापन बिलकुल नहीं हैं लेकिन ये शायद कमर्शियल मजबूरी थी और दर्शकों की तालियों के लिए जरूरी भी।

ये फिल्म पूरी तरह अनुष्का शर्मा के नाम है। मीरा के रोल में उन्होंने कई सीन में जान फूंक दी है। ख़ासतौर पर जब विलेन्स से जान बचाकर भागती हुई, पहाड़ पर चढ़कर वो चीख़ती हैं। बस फिल्म के आख़िरी सीन में वो किसी हिंदी मसाला फिल्म की हीरोइन बन जाती हैं लेकिन फिल्म की प्रोड्यूसर होने के नाते शायद वो जानती थी कि ऐसा करना ज़रूरी है। एक प्रोड्यूसर के तौर पर उन्होंने बेहद बोल्ड फिल्म बनाई है। नील ने भी अपने रोल बख़ूबी निभाया है। सतबीर के रोल में दर्शन कुमार को डायलॉग ज़्यादा नहीं मिले हैं लेकिन वो आंखों और खामोश चेहरे से सब ज़ाहिर कर गए हैं। फिल्म में उनका ख़ौफ़ साफ़ नज़र आता है।

फिल्म होते हुए भी एनएच 10 सच्चाई के बेहद क़रीब है, मनोरंजन भी करती है और आपको सीट से उठने तक नहीं देती। एक फिल्म से आपको और क्या चाहिए?


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