Monday , 27 May 2019
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आतंकियों से लोहा ले रहे सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करना आतंकवाद को खुला समर्थन है


जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान तीन आतंकियों के साथ जो अन्य लोग मारे गए उन्हें आम नागरिक के रूप में परिभाषित करना मुश्किल है। ये तो वे पत्थरबाज थे जो आतंकियों को बचाने के लिए सुरक्षा बलों पर पथराव करने के साथ ही उनके सुरक्षा घेरे को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। केवल इतना ही नहीं, वे आतंकियों से लोहा ले रहे जवानों के हथियार छीनने का भी दुस्साहस कर रहे थे। यह सही है कि सुरक्षा बलों से विषम परिस्थितियों में भी संयम बरतने की अपेक्षा की जाती है, लेकिन आखिर संयम की भी एक सीमा होती है।

यह किसी से छिपा नहीं कि पत्थरबाज कई बार घायल जवानों को अस्पताल ले जाने का रास्ता तक नहीं देते। गत दिवस ही यदि आतंकियों को मार गिराने की कोशिश में घायल जवान समय पर अस्पताल पहुंच जाता तो शायद उसकी जान बच जाती। सुरक्षा बलों को संयम की सीख देने वालों को इससे परिचित होना चाहिए कि पुलवामा में पत्थरबाजों पर गोली इसलिए चलानी पड़ी, क्योंकि लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन के इस्तेमाल के बाद भी वे जवानों की जान के लिए जोखिम बने हुए थे। आखिर यह हद दर्जे का पागलपन नहीं तो और क्या है? अगर पत्थरबाजों की खूनी हरकतों के कारण जवानों की जान पर बन आए तो फिर उनके सामने सख्ती बरतने के अलावा और क्या उपाय रह जाता है?

इससे इन्कार नहीं कि जब आतंकियों की घेरेबंदी के वक्त सुरक्षा बलों के काम में खलल डालने और आतंकियों को बचाने के लिए पत्थरबाजी करने वाले मारे जाते हैं तो पुलिस, अ‌र्द्धसैनिक बल और साथ ही सेना की कार्यशैली पर सवाल उठते हैं, लेकिन क्या सवाल उठाने वाले यह कह सकते हैं कि सुरक्षा बल पत्थरबाजों से निपटने के बजाय आतंकियों को भाग जाने दें? इस सवाल का जवाब उन कश्मीरी नेताओं को अवश्य देना चाहिए जो पत्थरबाजों की मौत पर अफसोस जताने और मानवाधिकारों का सवाल उठाने में देर नहीं करते।

आखिर ये नेता कभी यह क्यों नहीं कहते कि सुरक्षा बलों के अभियानों के दौरान होने वाली पत्थरबाजी आतंकवाद को दिया जाने वाला खुला और हिंसक समर्थन है। कश्मीर में पत्थरबाजी न केवल एक धंधा बन गई है, बल्कि आतंकियों को बचाने का हिंसक तरीका भी। जब भी पत्थरबाज मारे जाते हैं उनकी व्याख्या आम किशोर या युवक के तौर पर की जाने लगती है। आखिर कश्मीरी नेता कब तक इस सच से मुंह चुराते रहेंगे कि पत्थरबाजों को मौत के मुंह के झोंकने का काम जानबूझकर किया जा रहा है? उन्हें न केवल पत्थरबाजी के लिए उकसाया जाता है, बल्कि पैसे भी दिए जाते हैं। हालांकि इस सच से भी सभी परिचित हैं कि पत्थरबाज हुर्रियत कांफ्रेंस सरीखे गुटों के दैनिक वेतनभोगी कर्मी बन गए हैं, लेकिन इसके खिलाफ कभी आवाज नहीं उठती।

बेहतर हो कि कश्मीर की जनता यह समझे कि सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक, यासीन मलिक आदि युवाओं को पत्थरबाज बनाकर उन्हें जान-बूझकर मौत के मुंह धकेल रहे हैं। नि:संदेह इसी के साथ यह भी जरूरी है कि जम्मू कश्मीर पुलिस पत्थरबाजी के खूनी धंधे को ध्वस्त करे।


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