Wednesday , 24 July 2019
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अपनी मोहब्बत में उन्होंने हर इम्तेहान पास किया और शौकत से शौकत आजमी बन गईं


‘जब मैं छोटी थी तो मुझे नीली आंखों और भूरे बाल वाली गुड़िया चाहिए थी, लेकिन अब्बा मेरे लिए एक काली गुड़िया लाए थे। मैंने जब गुड़िया लेने से इनकार किया तो उन्होंने समझाया ‘ब्लैक इज ब्यूटीफुल टू’, उसी दिन मैंने जीवन का सबसे बड़ा सच सीखा था।’ यह कहना है मशहूर अभिनेत्री शबाना आजमी का। वह उर्दू के अजीम शायर कैफी आजमी के जन्म शताब्दी पर कमानी ऑडिटोरियम में आयोजित ‘जश्न ए कैफी’ में कैफी आजमी के साथ अपनी यादें साझा कर रही थीं।

अब्बू कैफी और अम्मी शौकत आजमी से जुड़ा एक वाकया सुनाते हुए उन्होंने कहा कि हैदराबाद के एक मुशायरे में कैफी ने जैसे ही अपनी मशहूर नज्म ‘औरत’ सुनाया, अपने भाई के साथ मुशायरे में पहली पंक्ति में बैठीं शौकत, कैफी पर अपना दिल हार बैठीं। इसके बाद अपनी मोहब्बत में उन्होंने हर इम्तेहान पास किया और शौकत से शौकत आजमी बन गईं। कैफी और शौकत आजमी की मोहब्बत के ऐसे ही किस्से अब उनकी जिंदगी का खजाना हैं।

उर्दू अकादमी दिल्ली की ओर से सजाई शाम में बतौर अतिथि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन भी पहुंचे। ‘जश्न ए-कैफी’ का आगाज करते हुए इमरान हुसैन ने कहा कि कैफी आजमी जिंदादिल शायर थे। उनकी शायरी और गजलों ने जिंदगी की तन्हाई को नया मोड़ दिया, जहां से अकेला आदमी मजबूत होकर उभरता है।

वहीं, जावेद अख्तर ने भी मकबूल शायर के साथ की अनमोल यादें साझा करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा पैशन और परिवार को तरजीह दी। शायर शकील जमाली की निजामत में वकार मानवी, तरन्नुम रियाज, मेहताब हैदर नकवी, हसीब सोज, खुर्शीद अकबर, शफक सौपारी, जावेद नसीमी, शकील आजमी, मनीष शुक्ला, पूजा भाटिया, अजहर इकबाल सरीखे नामचीन शायरों ने भी खूबसूरत कलाम सुनाकर समां बांधा।

शबाना ने एक बार दैनिक जागरण से बातचीत में कहा था- ‘अब्बा के पास कोई और पूंजी नहीं थी, सिवाय उनके कलमों के। उन्हें अलग-अलग तरह की कलमें जमा करने का शौक था। ‘मोर्बलांग’ पेन उनका फेवरेट था। वो अपने पेन को ठीक कराने के लिए विशेष रूप से न्यूयॉर्क के फाउंटेन पेन हॉस्पिटल भेजते थे और वो बड़े प्यार से अपने कलमों को रखते थे। बीच-बीच में उन्हें निकाल कर, पोंछ कर फिर रख देते। मैं जहां भी जाती उनके लिए कलम ज़रूर लाती। हर बार उनको कलम ही चाहिए होता। कलमों के प्रति कमाल की दीवानगी थी उनमें।’ 

शबाना अब्बा को याद करते हुए कहती हैं- ‘उनके कमरे का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता। हमारे घर में कभी कोई रोक-टोक नहीं हुआ करती कि अब्बा लिख रहे हैं तो उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना। हम बेधड़क उनके कमरे में चले जाते और वो बड़े प्यार से हमारे हर तरह के फ़िज़ूल सवालों का जवाब दिया करते।’ शबाना के मुताबिक- जब भी कैफी साहब कुछ लिखते तो ये नहीं कहते कि ये लिखा सुनोगी, वो हमेशा कहते कि एक नज़्म हुआ है सुनोगी? जैसे वो कुछ नहीं लिखते बल्कि कोई अदृश्य ताकत है जो उनसे ये सब लिखवाती है।

ये हैं कैफ़ी आज़मी की बतौर गीतकार मशहूर फिल्में

शमा, गरम हवा, शोला और शबनम, कागज़ के फूल, आख़िरी ख़त, हकीकत, रज़िया सुल्तान, नौनिहाल, सात हिंदुस्तानी, अनुपमा, कोहरा, हिंदुस्तान की क़सम, पाक़ीज़ा, हीर रांझा, उसकी कहानी, सत्यकाम, हंसते ज़ख्म, अनोखी रात, बावर्ची, अर्थ, फिर तेरी कहानी याद आई आदि।


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