Wednesday , 27 March 2019
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आदर्श आचार संहिता लागू होने के साथ ही लोकसभा चुनाव 2019 का आगाज हो गया है


 आदर्श आचार संहिता लागू होने के साथ ही लोकसभा चुनाव 2019 का आगाज हो गया है. कांग्रेस सहित कई प्रमुख दलों ने प्रत्याशियों की घोषणा भी शुरू कर दी है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी भी जल्द ही प्रत्याशियों की सूची लेकर सामने आ जाएगी… लेकिन जब ये सूचियां अंतिम रूप लेंगी तो हर पार्टी पहले से कम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतार पाएंगी, क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार पार्टियों ने अपनी ज्यादा सीटें गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़ी होंगी. ऐसे में नेताओं की एक बड़ी संख्या ऐसी होगी जिसे अपनी पार्टी से टिकट नहीं मिलेगा. वह या तो विरोधी दल से या फिर निर्दलीय खड़े होंगे और कांटे के चुनाव में वोटों का संतुलन तय करेंगे.

अगर संख्या के लिहाज से देखें तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टीऔर राष्ट्रीय लोकदल के बीच हुए गठबंधन के कारण इन पार्टियों के करीब 100 नेता ऐसे होंगे जो पिछले लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी थे, लेकिन इस बार गठबंधन के कारण उन्हें टिकट नहीं मिल पाएगा. इसी तरह बिहार में एक तरफ बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड के बीच गठबंधन होने से दोनों दलों के कम से कम 50 नेता ऐसे होंगे जिनको इस बार टिकट नहीं मिल पाएगा. जेडीयू पिछली बार 40 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ी थी. बीजेपी का पिछली बार रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से गठबंधन था. कुशवाहा अब महागठबंधन के पाले में चले गए हैं. ऐसे में बीजेपी को पहले से कहीं ज्यादा सीटें गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ेंगी. इसका मतलब हुआ कि पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़े प्रत्याशियों के अलावा कई वर्तमान वर्तमान सांसदों के भी टिकट कटेंगे.

यही हाल लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, आरएलएसपी और बाकी दलों के गठबंधन में होगा. यहां भी कम से कम 50 दमदार नेता टिकट पाने से वंचित हो जाएंगे.

देश में जैसे- जैसे आगे बढ़ेंगे तकरीबन हर राज्य में यही कहानी सामने आएगी. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, असम सहित पूरा पूर्वोत्तर, महाराष्ट्र हर राज्य में इस या उस तरह का गठबंधन है.

इस तरह देखा जाए तो पूरे देश में करीब 1000 ऐसे कद्दावर नेता हो जाएंगे, जो किसी पार्टी से टिकट नहीं पा सकेंगे. स्थानीय राजनीति में इनकी हनक, रसूख और आर्थिक ताकत किसी भी पार्टी से टिकट पाने वाले के बराबर ही होगी. ऐसे में ये नेता निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं. इन नेताओं की मूल पार्टी की कोशिश होगी कि वे इन्हें किसी तरह मनाएं और चुनाव लड़ने से रोकें. इसके एवज में पार्टी इनसे लुभावने वादे करेगी. वहीं, दूसरी पार्टी यह कोशिश करेगी कि उसका अपना बेटिकट नेता चुनाव न लड़े, लेकिन दूसरी पार्टी का नेता बागी होकर खड़ा हो जाए, इस तरह वह वोटकटवा का काम करे.

यूपी, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, असम, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में दोनों गठबंधनों के बीच कांटे की टक्कर है. पिछले चुनावों को वोट परसेंट या बाद में हुए विधानसभा चुनाव का वोट परसेंट देखें तो यह बात एकदम साफ नजर आएगी. ऐसे में अगर कोई निर्दलीय प्रत्याशी 10,000 वोट भी हासिल कर लेता है तो वह चुनाव का रुख मोड़ सकता है.

इसलिए चुनाव प्रचार में भले ही बड़े-बड़े मुद्दे सुनाई दें और राष्ट्रीय मुद्दों या व्यक्ति विशेष की बात हो, लेकिन जातिगत समीकरणों की पटरी पर लुढ़कने वाली चुनावी रेल में ये बेटिकट सियासी सवारियां खासी भूमिका अदा करेंगी. भारतीय चुनावों का पुराना तजुर्बा कहता है कि ये 1000 नेता 10,000 से 50,000 तक वोट आराम से हासिल कर सकते हैं. इतने वोट चुनाव की कुंडली तय करने के लिए पर्याप्त से बहुत ज्यादा हैं. इसलिए अगर आपको अपनी लोकसभा सीट के चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी करने का शौक है तो टिकट पाए नेताओं से ज्यादा बेटिकट नेताओं की ग्रह दशा पर नजर रखें.


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