Tuesday , 15 October 2019
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शरदपूर्णिमा: शीत ऋतु की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती


आस्थाएं, मान्यताएं और परंपराएं सदियों से चंद्रमा से जुड़ी हैं। आज भी चंद्र के अर्घ्य और दर्शन-पूजन की बहुत मान्यता है, क्योंकि मानव के लिए अभी भी चंद्रमा एक देवता हैं। मनीषियों ने यह प्रतिपादित किया है कि चंद्रमा की कलाओं के बढ़ने -घटने का प्रभाव मन:स्थिति पर भी पड़ता है और सबसे अधिक तंरगित करती है शरद पूर्णिमा।

मानव भले ही चांद पर पहुंच गया हो और वहां अपनी बुलंदियों के झंडे गाड़ दिए हों, लेकिन उसकी आस्थाएं, मान्यताएं और परंपराएं युगों-युगों से चांद से जुड़ी हैं। वह आज भी चांद को अर्घ्य देता हैं, दर्शन-पूजन करता है, कुछ मनौती मांगता है, क्योंकि उसने चंद्रमा को देवता माना है। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। मनीषियों ने यह प्रतिपादित किया है कि चंद्रमा की कलाओं के घटने-बढ़ने का प्रभाव मन:स्थिति पर भी पड़ता है। सबसे ज्यादा तंरगित करती है विजयादशमी के बाद मनाई जाने वाली शरदपूर्णिमा। शीत ऋतु की शुरुआत इसी दिन से मानी जाती है।

शरद पूर्णिमा अमृतमयी रात्रि भी मानी गई है। उल्लेख मिलते हैं कि प्राचीन काल में शरद पूर्णिमा की रात वैद्यों द्वारा विभिन्न जड़ी- बूटियों से औषधियां बनाई जाती थीं। मान्यता थी कि शरदपूर्णिमा की चंद्र किरणें अन्न-वनस्पति में औषधीय गुण सींचती हैं। आज भी कुलीन घरों में शरद पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर चांद की रोशनी में रखने का रिवाज है। यह केवल एक परंपरा ही नहीं, बल्कि विज्ञान भी इसकी पुष्टि करता है।

 


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