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आखिर क्यों बदल रहा है फिल्मो का स्वरूप


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अंकिता पाण्डेय, लखनऊ 28 जनवरी-खबर इंडिया नेटवर्क। समय के साथ-साथ प्यार के मायने भी बदलते जा रहे है| जहां पहले हीर-रांझा, रोमियो-जूलियट, शीरीं-फरहाद का नाम प्यार में अमर कहा जाता था, जिन्होंने प्यार के लिए अपनी जान दे दी, वही आज कल लोग जान देते नहीं लेते है| क्या सच्चा प्यार सिर्फ किताबी बाते रह गयी है, या फिल्मो में मनोरंजन के लिए?
फिल्मो के प्यार ने लोगो की सोच और प्यार के मायने बदलने में अहम भूमिका निभाई है| एक्शन, रोमांस, कॉमेडी, सस्पेंस अब सब बदल गया है| जहा दो दशक पहले प्यार को शांति, पूजा या जिन्दगी बताया गया जिसमे प्रेमी प्रेमिका के लिए जान तक दे सकता था, वही आज के दशक में प्यार को कमीना, कमबख्त या डफर बताया गया है| यहाँ प्यार ना मिलने से प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे को मार देते है| एक्शन ऐसा कि हीरो इधर से उधर उड़ के मार रहा है| रोमांस अश्लीलता से शुरु होता है और कपड़े उतरने के बाद ख़तम होता है | कॉमेडी सीधी सादी नहीं, दोहरे अर्थों वाली होती है| लोगो की सोच हो, या लोगो में आ रहे परिवर्तन, लेकिन शायद सब दर्शक इसी तरह की फिल्मेदेखना पसंद कर रह है| क्या अब लोगो को अश्लीलता पसंद आने लगी है?
कारण जो भी हो इसका आगे आने वाली पीढ़ी पर बुरा असर पड़ने लगा है| आज के युवा परिवार के साथ बैठ कर न फ़िल्में देख सकते हैं और न ही मनोरंजन की बातें कर सकते हैं| आगे आने वाली फिल्मे शायद ऐसी होंगी की युवाओं के सिवा और कोई उसे देखने की हिम्मत भी ना कर पाए|
फ़िल्में लिखने वाले, उनका निर्माण और निर्देशन करने वाले सिर्फ इस आधार पर नहीं बच सकते है कि वो तो वही करते हैं जो दर्शाक चाहते हैं| आखिर दर्शक भी तो सिर्फ वही देख सकते हैं जो बनाया जा रहा है?


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