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खासियत ‘आप’ की


 

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प्रियांषु गुप्ता,लखनऊ/खबर इंडिया नेटवर्क-30 जनवरी।  ‘कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो’
दुष्यंत कुमार का यह मषहूर सेर भारतीय राजनीति में ‘आप’ की इंट्र्री को षायद बाखूब चित्रित करता है। बिना कोर्इ खाष संगठन, खाष धन, खाष अनुभव, खाष बड़े नाम लेकर चुनाव लड़ना और जीतना आसमान में सूराख नही ंतो और क्या है?
‘आप ने जिस तरह चंद महीनों में राजनीति से लेकर लोकबाग के बीच जो जगह बनार्इ है, उसका सानी ढूंढने के लिऐ अगर दषकों पुराना इतिहास खंगालना पड़ रहा है, तो आखिर क्यों? आखिर इस नवजात दल में आम आदमी को ऐसा क्या दिखा जो अन्य स्थापित दलों में दुर्लभ था। जवाब है, नीति, नियत और नौतिकता।
अलबत्ता, देष की दोनों प्रमुख पार्टियों भाजपा व कांग्रेस में नीतियां तो भरपूर हैं। अभाव है तो महज़ नियत और नौतिकता का। सवाल नैसर्गिक है, क्या कोर्इ भी नीति, नियत व नौतिकता के अभाव में सफल हो सकती है?
पिछले ही दिनों देष ने अपना 65वां गणतंत्र दिवस मनाया है। इसमें कोर्इ दोराय नहीं कि हम पूर्णतय: गणतांत्रिक मुल्क हैं। लेकिन क्या इतने भर से हमें खुद को आज़ाद समझने का दम्भ पालना उचित होगा? गोराें को पदच्युत करके कालों को तिलक करना, भ्रष्ट गवरनेंस की अधीनता, सेवक (मंत्री वगैरा) सड़कों पर तष्रीफ फरमाऐं तो मालिक (जनता) को एक किनारे दुबकाया जाना इत्यादि, यही है असल आज़ादी का स्वरूप? विद्रूप, भयावह, विडम्बनिय। जवाब अगर हां है, तो मैं कदाचित नहीं मान सकता कि हम आज़ाद हैं। हां! गणतांत्रिक होने का ढ़ोग, हमसे छीननें का अधिकार किसी को नही। आम आदमी पार्टी इन्हीं अनुत्तरित सवालों की छटपटाहट है।
एक कहावत है कि कोर्इ भी मुकम्मल नहीं होता है। लिहाजा, आम आदमी पार्टी में, उसके नीति-निर्धारकों में व उसके नेताओं में भी खोट हो सकता है, और यह कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं। लेकिन कुछ अज्ञात ‘कमियों’ को बगैर जाने-चीन्ह,ें ‘आप को अन्य दलों के समकक्ष खड़ा करने की कोषिष कितनी न्यायसंगत है? ‘आप’ के वरिष्ठ नेता योगेंद्र यादव कहते हैं कि तूफान में कुछ कचरे भी साथ बह आते हैं। तो इनसे छुटकारा कैसे पाया जाऐ? बक़ौल योगेंद्र यादव-‘बारीकी से फिल्टर की आवष्यकता है।
बेशक केजरीवाल वगैरा को इस महादेष का नीति-नियंता नही बनाया जाना चाहिऐ। लेकिन ‘आप’ नही तो कौन? दरअसल, मौजूदा हालात में ‘आप का विकल्प या तो ‘आप ही है, या कोर्इ ऐसी पार्टी पैदा हो जो षुचिता में ‘आप’ से बेहतर बरते।
हो सकता है कि दिल्ली में साक्षरता अधिक है, वहां बुद्धिजीवी वर्ग रिहाइष करता है, इसलिऐ ‘आप 28 सीटें निकालनें में सफल हुर्इ। लेकिन नहीं भूलना चाहिऐ कि ‘आप का इंतिखाब (चुनाव) उन लोगों ने भी किया है, जिन्हें ‘मैंगों मेन इन बनाना समझा जाता है। हो सकता है, ‘आप’ यूपी-बिहार जैसे इलाकों में अपेक्षित प्रदर्षन न कर पाऐ। लेकिन इसका मुनाफ़ा किसको होगा? किसानों को, युवाओं को, बुजुर्गों को, विधवाओं को, भूखे-नगें-निरक्षरों को, अल्पसंख्यकों को, या बीजेपी, कांग्रेस व अन्य दलों को?


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