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44 दिन बाद मिला लखनऊ को नया एसएसपी, राजेश पाण्डेय को कमान


लखनऊ,(एजेंसी)17 जून। 44 दिनों बाद आखिरकार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ को नया एसएसपी दे ही दिया। 2006 बैच के आईपीएस अफसर राजेश कुमार पाण्डेय लखनऊ के नए वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाये गए हैं। वे अभी तक गोंडा के पुलिस अधीक्षक थे। राजेश पाण्डेय को इस पद पर तैनात किये जाने की चर्चाएँ पिछले एक महीने से सत्ता के गलियारे में थी। प्रदेश शासन ने सोमवार को कुल 4 आईपीएस अफसरों के तबादले किये हैं।

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इलाहाबाद के एसएसपी वी.पी. श्रीवास्तव को हटा दिया गया है। उनके स्थान पर के एस. इमैनुअल को तैनात किया गया है। आर.पी.एस यादव को एक बार फिर गोंडा का एसपी बनाया गया है। इलाहाबाद से हटाये वी.पी श्रीवास्तव को 37 वी वाहिनी पीएसी कानपुर का सेनानायक बनाया गया है। दूसरी बार गोंडा भेजे गए राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव 2003 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं जिन्हें पिछले महीने शाहजहांपुर के एसपी पद से हटा कर डीजीपी मुख्यालय से सम्बद्ध किया गया था।

लखनऊ के नए एसएसपी राजेश पाण्डेय पूर्व में प्रांतीय पुलिस सेवा के अफसर के तौर पर यहाँ क्षेत्राधिकारी और अपर पुलिस अधीक्षक नगर पूर्वी के पद पर काफी समय तक काम कर चुके हैं। वे एसटीएफ के स्थापना काल में पुलिस उपाधीक्षक तैनात किये गए थे और लम्बे समय तक वहां अपर पुलिस अधीक्षक भी रहे हैं। आईपीएस में प्रोन्नति के बाद अखिलेश यादव सरकार ने उन्हें रायबरेली जिले का पुलिस अधीक्षक और सहारनपुर का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक तैनात किया था। इसी के साथ लखनऊ के इतिहास में दशकों बाद पहली बार 44 दिन तक किसी एसएसपी की तैनाती नहीं होने का अनूठा रिकार्ड भी बन गया है।

दरअसल अपनी शर्तों पर नौकरी करने की जिद के चलते ही लखनऊ पुलिस के इतिहास में नया रिकार्ड दर्ज कराने का श्रेय 2000 बैच के आईपीएस अफसर यशस्वी यादव को जाता है। जो पांच साल की अंतर्राज्य प्रतिनियुक्ति पर उत्तर प्रदेश में तैनात हैं। आम तौर पर अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों को गृह राज्य में प्रतिनियुक्ति तीन वर्ष के लिए होती है और परिस्थितियों के हिसाब से दो और वर्षों के लिए बढ़ जाती है लेकिन राज्य में अखिलेश यादव की सरकार आने के बाद जब यशस्वी यादव यहाँ आये तो उनके पास सीधे पांच साल की तैनाती के आदेश थे। काफी दबाव के बाद जब दो मई को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उन्हें लखनऊ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद से हटाया तबतक उन्होंने प्रदेश शासन को इस बात की सूचना नहीं दी थी कि मूल कैडर में उनकी तरक्की डीआईजी के पद पर हो चुकी है। यशस्वी यादव ने सत्ताशीर्ष को अपनी सफाई देते हुए लगातार कोशिश की कि उन्हें फिर से लखनऊ पुलिस की कमान दे दी जाय लेकिन दबाव कुछ ज्यादा ही था और उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हुई। ऐसी सूरत में उन्हें प्रदेश शासन के समक्ष वर्ष 2014 का महाराष्ट्र शासन का वह आदेश प्रस्तुत करना पड़ा जिसमें उन्हें पदोन्नति दी गयी थी। लखनऊ के एसएसपी पद पर बने रहने की उनकी मंशा भले ही पूरी न हो पायी हो, उनके चक्कर में यह कुर्सी तैतालिस दिन तक खाली रही।

यह अलग बात है कि लखनऊ में एसएसपी की नियमित तैनाती के मुकाबले इन तैतालिस दिनों में अपराध नियंत्रण और क़ानून ब्यवस्था की स्थिति तुलनात्मक दृष्टि से बेहतर रही, लेकिन इतने दिन तक इतने महत्वपूर्ण जिले के इतने महत्वपूर्ण पद को खाली रखने का नकारात्मक कीर्तिमान अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्वकाल के खाते में दर्ज होगा। प्रदेश के पुलिस महकमें ही नहीं, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में भी अखिलेश यादव सरकार की असमंजस वाली सोच पर हैरानी हो रही है। नौकरशाही में चर्चा है कि किसी अफसर से अपने निजी सम्बन्ध निभाने की कीमत पर लखनऊ में तैनाती के मामले को इतना लटकाया जाना प्रदेश सरकार की छवि खराब करता है।


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