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आईएएस द्वारा बेइज्जती के बाद पीसीएस संवर्ग में बढ़ा गुस्सा, एसोसिएशन से भी खफा


लखनऊ,(एजेंसी)18 जून। कानपुर में पीसीएस संवर्ग के दो अधिकारियों के साथ घटित अप्रिय एवं अशोभनीय घटना ने एक बार फिर यह उजागर और साबित कर दिया है कि आईएएस की निगाह में पीसीएस का कोई वजूद ही नहीं है, वे उन्हें निकृष्ट और अपने को बेहतर मानते हैं।

आईएएस अधिकारियों की तुनकमिजाजी और अहंकार से लगातार पीड़ित होते सूबे के पीसीएस अधिकारियों का गुस्सा अपने एसोशियेशन पर भी फूट रहा है। कानपुर में तैनात दो पीसीएसअधिकारियों के साथ हुई घटना ने इस संवर्ग के अधिकारीयों के सब्र का पैमाना छलका दिया है।

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घर से बेदखल पीडि़त कानपुर के पूर्व सीडीओ राजेन्द्र सिंह यादव और गनर वापसी से आहत एवं क्षुब्ध नगर आयुक्त उमेश प्रताप सिंह दोनों ही इस सारे प्रकरण को यह देखकर जोड़ते हैं कि चूंकि इस वक्त उनका एसोसिएशन निष्क्रियता के चरम पर है, जिसके चलते आइएएस अफसर अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आ रहे हैं। दोनों ही इस घटना के लिए अपने पीसीएस एसोसिएशन को ही दोषी ठहरा रहे हैं। दोनों अधिकारीयों का यही कहना है कि उनका एसोसिएशन यदि आज एक्टिव होता तो ऐसी हिमाकत करने की किसी की हिम्मत न पड़ती।

राजेन्द्र सिंह का तो यही कहना है कि आईएएस से सभी डरते हैं। उनके खिलाफ बोलने की किसी की हिम्मत नहीं है। राजेन्द्र सिंह कानपुर के जिलाधिकारी डॉ. रोशन जैकब द्वारा मकान खाली कराने के आदेश के संदर्भ में कहते हैं कि जिस तरह भारी फोर्स भेजकर मेरा सामान निकलवाया और जब्त करवाया गया वह कहीं से भी न्याय संगत और तर्क संगत नहीं है। भारी फोर्स किस लिए भेजी गई थी? क्या मैं चोर, डकैत हूं या फिर कोई आतंकवादी? मेरे साथ इस तरह के सुलूक की आवश्यकता नहीं थी। मैंने तो अपना सामान पैक तक कर लिया था। अपने साथ हुई बर्बर और घिनौनी कार्रवाई के विरुद्घ मैं न्याय पाने और अपने को सही साबित करने का पूरा जोर लगाये बैठा हूं। मैं न्याय के साथ हूं, इसीलिए कानपुर से तबादले के बाद भी लड़ाई लड़ रहा हूं, मुझे किसी का डर नहीं है। मैं सत्य और सही के साथ हूं।

राजेन्द्र सिंह इस समय पंचायती राज विभाग में अपर निदेशक के पद पर कार्यरत है।

राजेन्द्र सिंह के इस मुहिम में कई वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी एवं पीसीएस संघ के पूर्व अध्यक्ष भी उनके साथ हैं। सभी का यही कहना है कि यह लड़ाई तो उनके संवर्ग के मान-सम्मान की है। एक वरिष्ठ पीसीएस का तो यहां तक कहना है कि आज यदि संघ सक्रिय होता तो किसी भी अधिकारी के साथ ऐसी घटना नहीं घटती। संघ के पदाधिकारियों को कानपुर की इन दोनों घटनाओं ने एक चुनौती दे दी है। इन घटनाओं से सबक लेना चाहिए या फिर उन्हें संघ छोड़ देना चाहिए।

कानपुर के पूर्व सीडीओ का सामान बंगले से जबरन बाहर, नगर आयुक्त का गनर छिना

कभी भारत के मैनचेस्टर कहलाने वाले कानपूर की हालत इन दिनों काफी पतली है। आला अधिकारियों में संवाद और संवेदनहीनता काफी बढ़ गयी है। एक दूसरे की टांग खिंचाई और एक हद तक अहं के टकराव से अप्रिय माहौल जन्म ले चूका है। बड़े और छोटे अधिकारी एक दुसरे के विरुद्ध इस कदर मोर्चा खोले हुए हैं कि बहस और विवाद का एक लम्बा सिलसिला चल निकला है यद्यपि जहाँ प्रशासनिक अधिकारीयों के बीच सहजता, सद्भाव और संवेदनशीलता का होना जरूरी होता है, वहीं ऐसा न होने से अप्रिय घटनाओं के चलते विकास कार्यों का बाधित होना लाजमी है।

लगभग एक ही समय के आस-पास ऐसी दो घटनाएँ यहाँ कुछ इस अंदाज में घटित हुई कि सारा माहौल ही अशांत हो चला है। एक घटना में जिलाधिकारी डॉ. रोशन जैकब द्वारा पूर्व मुख्य विकास अधिकारी एवं वरिष्ठ पीसीएस को बंगले से बेदखल करवा दिया तो दुसरे अधिकारी उमेश प्रताप सिंह (नगर आयुक्त) का गनर भी छीन लिया गया दोनों का यह दर्द इस कारण और छलक उठा है कि उन्हें यह सब इसलिए सहना और देखना पड़ रहा है कि उनका पीसीएस एसोसिएशन मरणासन्न हालत में है, जिसके चलते उन्हें आईएएस द्वारा प्रताडि़त होने का दंश झेलना पड़ा है। दोनों ही अधिकारी अपने एसोसिएशन की निष्क्रिय होने और पंगु होने के चलते क्रोध से सरोबार हैं और ऐसी अप्रिय घटना के लिए एसोसिएशन को ही जिम्मेदार मान रहे हैं।

राजेन्द्र सिंह यादव यहां बतौर मुख्य विकास अधिकारी अक्टूबर, २०१३ में नियुक्त हुए थे। इसी के साथ १९ अगस्त २०१४ से उनके पास प्रबंध निदेशक हथकरघा एंव यूपिका का अतिरिक्त प्रभार भी मिला हुआ था। उन्हें मुख्य विकास अधिकारी से रूप में प्रशंसा भी शासन द्वारा मिली थी। लेकिन उनका मानना है कि कुछ ऐसे भी अधिकारी थे जिन्हें उनके विकास कार्यों में गहरी रूचि को लेकर एतराज था। ऐसे लोगों ने गोलबन्द होकर जिलाधिकारी डॉ. रोशन जैकब के कान भरने शुरू कर दिए उनके बहकावे में आकर जिलाधिकारी ने शासन को यह लिख भेजा कि राजेन्द्र सिंह हथकरघा विभाग के दायित्वों का बहाना बनाकर प्राय: जनपद से बाहर रहते हैं, जिसके चलते विकास कार्य बाधित हो रहे हैं, यह शिकायत ऐसे समय की गई जब विकास कार्यों में कानपुर नगर पूरे प्रदेश में आठवें नम्बर पर था। इस परिचय में उनके मुख्य विकास अधिकारी का चार्ज लेकर २९ जनवरी २०१५ को आईएएस अधिकारी शम्भू कुमार की नियुक्ति हो गयी। शम्भू कुमार को वहीं बंगला एलाट कर दिया गया जिसमें राजेन्द्र सिंह रहते थे। राजेन्द्र सिंह को यूपिका से प्रबंध निदेशक के पद पर रहने के चलते रावतपुर स्थित आफीसर्स कालोनी में आवास आवंटित कर दिया गया। लेकिन पूर्व सीडीओ ने यह बंगला यह कहकर खाली नहीं किया कि मेरी बड़ी बेटी की १० मार्च २०१५ से वार्षिक परीक्षाएं होनी है।

इसके बाद तेजी से बदलते घटनाक्रम में पहले सिटी मजिस्ट्रेट ने और फिर नाजिर आादि ने उन्हें सूचित किया कि जिलाधिकरी चाहती है कि नये मुख्य विकास अधिकारी का सामान रखने के लिए दो कमरे खाली कर दें लेकिन इस पर भी राजेन्द्र सिंह की असमर्थता ने जिलाधिकारी का पारा गरम कर दिया।

फिर नतीजा यह निकला कि प्रतिदिन कोई न कोई आकर यह भी होमगार्ड एंव चपरासी आकर उन्हें बंगला खाली करने की धमकी देने लगे थे। इन कृत्यों से परेशान होकर उन्होंने हाईकोर्ट की शरण ले ली। हाईकोर्ट ने उन्हें २३ मार्च २०१५ तक इस बंगले में रहने की इजाजत दे दी थी। लेकिन राजेन्द्र सिंह बच्चों की परीक्षा में व्यस्तता के चलते उक्त तारीख को अपना सामान नहीं हटा सके थे। अपनी विवश्ता के लिए उन्होंने सिविय मिस. मोडीफिकेशन एप्लीकेशन नं. ०९०३८ मा. उच्च न्यायालय में दाखिल कर दिया और यह अनुरोध भी किया कि फाइनल शिफ्टिंग के लिए थोड़ा और समय दिया जाए। इसकी जानकारी भी उन्होंने जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एंव प्रभारी अधिकारी आवास-एसीमए-6 को दे दी। इसके बाद राजेन्द्र सिंह ने काफी भागदौड़ कर लखनऊ में मकान भी खोज लिया तथा परिवार को भी लखनऊ शिफ्ट कर दिया। वह अपना सामान शिफ्ट कर चुके थे और जल्द ही बंगला भी खाली करने वाले थे। इस बीच ०८.०४.२०१५ को प्रमुख सचिव हथकरघा एंव वस्त्रोद्योग ने लखनऊ में एक मीटिंग बुला ली और वह इसमें भाग लेने राजधानी चले आए, लेकिन जिलाधिकारी को न जाने क्या सूझा कि उन्होंने डीडीओ सिटी मजिस्ट्रेट एसीएम-6 एंव सीओ कोतवाली सहित भारी फोर्स उनके बंगले पर भेजकर जबरदस्ती सामान बाहर करवा दिया।

जिस समय यह काण्ड घटित हुआ उस समय बंगले पर उनका नौकर व गार्ड ही मौजूद थे। जिलाधिकारी के आदेश का पालन करते हुए न केवल अधिकारियों ने उनका सामान बंगल से बाहर ही कराया बल्कि शम्भू सिंह का सामान भी बंगले में शिफ्ट करा दिया। गार्ड और नौकर की बात माने तो उन्हें बंगले में ही एक तरह से बंधक ना दिया गया था। इसकी सूचना नौकर गुड्डू और गार्ड उमेश पाठक ने अपने परिजनों को देते हुए कहा कि वे बंगले मे फंके हुए हैं उन्हें यहां से निकालने में मदद करें। इस दौरान इन लोगों से सादे कागज पर हस्ताक्षर भी करा लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद जब राजेन्द्र सिंह कानपुर लौटे तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था क्योंकि वह अपने को पूरी तरह बेइज्जत महसूस कर रहे थे। वह अपना सामान भी चाहते थे लेकिन कोई सक्षम अधिकारी न होने से वह अपना सामान भी नहीं ले पाये।

इस प्रकरण पर अपने को पूरी तरह निदोष बताते हुए राजेन्द्र सिंह का कहना है कि इस मामले में जिलाधिकारी ने मेरे पीसीएस होने का नाजायन फायदा उठाते हुए अपने संवर्ग से आए मुख्य विकास अधिकारी का पक्ष लिया और मेरे साथ भरपूर ज्यादती की। उन्होंने यह भी कहा कि मौंने किसी नियम का उल्लंघन नहीं किया और मानवीय आधार पर भी मुझसे अभद्रता की गई। दरअसल यह बेइज्जत करने वाला कारनामा जिलाधिकारी ने इस कारण कर दिखाया क्योंकि उनकी नजर में पीसीएस अफकर का कोई वजूद नहीं है। दरअसल जिलाधिकारी आईएएस होने का अपना रसूख पूरी तरह दिखा रही है।

राजेन्द्र सिंह का तो खुला आरोप है कि जिलाधिकरी ने मेरे साथ खुन्नस निकाली है क्योंकि भेदभावपूर्ण तरीके से मेरे विरुद्घ कार्रवाई किए जाने को लेकर १४ बिन्दुओं पर मुख्य सचिव सहित तमाम आला अधिकारियों को सूचना भी दे दी है। राजेन्द्र सिंह अपने साथ हुई ज्यादती को लेकर इस कदर डरे और सहमे हुए हैं कि वह अपना सामान भी नहीं ले पा रहे हैं। उनका कहना है कि सामान दिलाने के लिए कोई सक्षम अधिकारी नियुक्त किया जाए। फिलहाल मुझे न तो मेरा सामान ही दिया जा रहा है और न ही इसाके बारे में कुछ बताया ही जा रहा है।
१९९७ बैच के राजेन्द्र सिंह ने पीसीएस एसोसिएशन के अध्यक्ष को भी इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी, लेकिन अध्यक्ष द्वारा उदासीनता ओर उपेक्षापूर्ण रवैये से वह काफी आहत है।

गनर से महरूम नगर आयुक्त

कानपुर से नगर आयुक्त उमेश प्रताप सिंह भी राजेन्द्र सिंह की ही तरह अपमानित हुए हैं। उनसे तो उनका गनर ही छीन लिया गया है। इसके चलते दुखी और निराश उमेश प्रताप सिंह ने भी अपने एसोसिएशन से कुछ करने की गुहार लगायी लेकिन उन्हें भी निराशा का सामना करना पड़ा। उमेश प्रताप सिंह का तो कहना है कि गनर यदि वापस लेना ही था तेा एक महीने बाद यह कार्रवाई होती तो मुझे कोई एतराज न होता, लेकिन विगत १५ मई को आयुक्त, कानपुर मण्डल की अध्यक्षता में कानपुर समग्र विकास योजना की आयोजित बैठक के दौरान जब मैंने ए टू जेड व उनके प्रतिनिधियों के विरुद्घ प्राथमिकी दर्ज न होने के संबंध में जिलाधिकरी एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से चर्चा की तो इसके बाद ही १६ मई को भले ही प्राथमिकी दर्ज हो सकी, लेकिन बदले की नियत से २० मई को मेरी सुरक्षा में तैनात गनर को पुलिस प्रशासन द्वारा वापस बुला लिया गया।

उमेश प्रताप सिंह का कहना है कि फोर्स के लिए मैं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के दरवाजे पर चक्कर नहीं लगाऊंगा। लेकिन मैंने जब अपने एसोसिएशन के अध्यक्ष से अपने साथ हुई ज्यादती का हवाला दिया तो उन्होंने व्यक्तिगत मतभेद बताकर पल्ला झाड़ लिया। उमेश प्रताप सिंह तो अपने एसोसिएशन से इस कदर खफा हैं कि उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि एसोसिएशन की मरणासन्नता एवं निष्क्रियता से कैडर का कोइ गांव सम्मान नहीं रह गया है। अब तो हर पीसीएस को अपनी लड़ाई खुद ही लडऩे के लिए तैयार रहना होगा लेकिन एसोसिएशन का नया चुनाव हो ताकि लड़ाकू और जागरूक अधिकारी चुने जाएं। यदि शीघ्र एसोसिएशन की बैठक नही हुई तो कानूनी कार्रवाई करने से भी मैं पीछे नहीं हटूंगा। इस एसोसिएशन के प्रति मेरा पूरा विरेध है क्योंकि यह केवल कागजों तक सिमटा हुआ है मैं तो नोटिस देकर चुनाव की मांग करता हूं और यदि निकट भविष्य में संवैधानिक तरीके से चुनाव नहीं हुए तो मैं सीधा कोर्ट चला जाऊंगा उस एसोसिएशन का नया फायदा जिसमें कभी-कभी एकाध बैठकों में चार आदमी भी कायदे के न जुटते हों। गनर के माध्यम से कैडर को अपमानित किये जाने की इस घटना को मैं अपने ढंग से लडूंगा। इसके पूर्व भी मैंने बरेली में अपनी लड़ाई खुद लड़ी थी।


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