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समय के साथ बदली ‘NETA’ की परिभाषा


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लखनऊ,एजेंसी-10 मार्च । एक ही रंग की बड़ी-बड़ी व महंगी लक्जरी गाड़ियों का काफिला, गाड़ियों के शीशे पर लगी काली फिल्म, सभी गाड़ियों की नंबर प्लेटों पर लिखे एक समान अंक व गाड़ियों के अंदर सुरक्षाकर्मी के रूप में बैठे राइफल व बंदूकधारी और इन सबके अगुआ सफेद रंग का वस्त्र पहने हुए नेताजी और इनके साथ जुड़ी हुई मुकदमों की एक लंबी फेहरिस्त। यूपी की सियासत में इस तरह के नजारे और इस तरह के नेताओं की पहचान आम हो चुकी है।
पिछले दो दशकों में सियासतदानों के रसूख ने पूरे देश की सियासत का अंदाज ही बदल कर रख दिया है। नेता बनने का ख्वाब अपनी आंखों में संजोए बाहुबलियों ने जैसे ही सियासत में प्रवेश किया, सियासत दागदार होती गई और आज तो ये दूध में पानी की तरह घुलमिल गई है, जिसे अलग करना ही असंभव नजर आ रहा है। अब तो कई ऐसे सफेदपोश हैं जो खुद को बाहुबली कहलाने पर फक्र महसूस करते हैं। जिन क्षेत्रों में ये चुनाव प्रचार के दौरान जनसभाएं आयोजित करते हैं। वहां क्षेत्र के दौरे के दौरान अपनी लक्जरी गाड़ियों का प्रदर्शन करना इनके लिए अपना रसूख दिखाना और रुतबा प्रदर्शन करने का अहम जरिया है।
ऐसा कहना बिल्कुल उचित नहीं है कि नेता शुरू से ही ऐसे होते थे। समय बदलने के साथ ही साथ नेता शब्द की परिभाषा भी बदलती रही। दो दशक से भी पहले की बात करें तो नेता शब्द का पूर्ण अर्थ जननायक हुआ करता था, वह व्यक्ति जिसके क्षेत्र में निकलते ही एक विशाल जनसमूह उसके पीछे चलने लगता था और जब वह जननायक हुंकार भरता था तो लोगों की गर्जना से आसमान भी हिल जाता था। उस समय के जननायक अपने बारे में सोचने के बजाय जनमानस के हित का ही कार्य किया करते थे। वे गाड़ियों से चलने के बजाए पैदल चलना ही पसंद किया करते थे और वह भी सिर्फ इसलिए कि आमजन उनसे कदमताल कर चल सकें।
महात्मा गांधी, पंडित जवाहर लाल नेहरू, जय प्रकाश नारायण, लाल बहादुर शास्त्री, बी.आर.अंबेडकर, राम मनोहर लोहिया आदि कुछ ऐसे नाम आज भी उदाहरण के तौर पर लिए जा सकते हैं। वहीं, बदले हुए दौर की बात करें तो यूपी परिवहन निगम की एक बस के कंडक्टर के मुताबिक उसने अपने 12 सालों के सेवाकाल के दौरान कभी भी बसों में दी जाने वाली इन माननीयों की सीट पर किसी भी सांसद या विधायक को बैठे हुए नहीं देखा। कुछ ऐसा ही कहना बाकी के कंडक्टरों का भी है। अगर हम इन सभी कंडक्टरों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करें तो निष्कर्ष यह निकलता है कि सरकारी बसों में इन माननीयों की सीट महज दिखावा बनकर ही रह गईं हैं और हो भी क्यूं न! अगर ये माननीय सरकारी बसों में बैठेंगे तो इनका रसूख कम नहीं हो जाएगा?
अगर नेता और माननीय बसों में बैठते हैं तो आम जनता और इनमें फर्क ही क्या रह जाएगा। लगता है सियासतदानों के इसी रसूख भरे अंदाज को पहचानते हुए सूबे के मुखिया ने सभी 403 विधायकों को क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाली विधायक निधि से 20 लाख रुपये तक की गाड़ी खरीदने की छूट दे डालने का फैसला किया था। भले ही इससे सरकार के ऊपर 80 करोड़ 60 लाख रुपये तक का अतिरिक्त भार क्यूं न बढ़ जाता, हालांकि विपक्षियों के विरोध के बाद यह फैसला तत्काल वापस ले लिया गया। रसूख के बढ़ने से जनप्रतिनिधियों के साथ आपराधिक मुकदमा जुड़ना भी अब आम हो चला है। वर्तमान में देश की कुल 543 सीटों से निर्वाचित होकर संसद पहुंचने वाले 272 सांसद ऐसे हैं जो कि किसी न किसी मामले में अभियुक्त हैं।
वैसे तो इन माननीयों को मामला पंजीकृत होने के बाद और न्यायालय द्वारा दोष साबित होने के बाद अपराधी करार दिए जाने व सजा सुना दिए जाने के बाद भी इन्हें अपराधी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन जनप्रतिनिधियों के लिए बनाए गए नियम (39) में साफ साफ कहा गया है कि अगर किसी जनप्रतिनिधि को कोई निचली अदालत दोषी करार देते हुए सजा सुनाती है तो वह जनप्रतिनिधि सजा सुनाए जाने के तीन माह के अंदर ऊपर की न्यायलय में याचिका दायर कर सकता है।
इसके बाद न तो उस जनप्रतिनिधि का पद छीना जाएगा और न ही उसे चुनाव लड़ने से रोका जाएगा, बचपन में सभी ने नागरिक शास्त्र में पढ़ा होगा कि चुनाव सिर्फ वही लड़ सकता है जो कि अपराधी न हो, तो यह नियम (39) यही बयां कर रहा है कि माननीय कुछ भी करें, अपराधी नहीं कहे जा सकते और इसका यही नतीजा है की 543 सांसदों में से 272 सांसदों पर मुकदमे पंजीकृत हैं। फिर भी ये लोग संसद में बैठकर उसे अपने हिसाब से चला रहे हैं।
यही वजह है कि शायद इन नेताओं का दिल ऊपरवाले से यही दुआ करता होगा “जो अब किए हो दाता ऐसा की कीजो, अगले जनम मोहे नेता ही कीजो” सामाजिक चिंतक ज़े पी़ शुक्ल कहते हैं कि राजनीति में खासकर यूपी की राजनीति में अपराधिक छवि के लोगों की संख्या बढ़ने की एक बड़ी वजह यह है कि आज आम लोगों में यह मनोवृत्ति बन गई है कि बाहुबली और आपराधिक छवि का नेता ही उनके काम करा सकता है। साफ सुथरी छवि के नेताओं की न तो पुलिस सुनती है न ही अधिकारी। रबिनहुड जैसी छवि के चलते भी राजनीति में लगातार बाहुबलियों को बहुत कम समय में सफलता मिल रही है।


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