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बीवी-बच्चों को टिकट दिलाने पर मंत्रियों में सिर-फुटौवल


BJP
भोपाल,एजेंसी-11 मार्च। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप लगाकर हमले करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी धीरे-धीरे यह रोग घर करने लगा है। यही कारण है कि राज्य सरकार के कई मंत्री को अपने नाते रिश्तेदारों के अलावा चुनाव लड़ने के काबिल और कोई दूसरा नजर नहीं आ रहा है। लोकसभा चुनाव में आधा दर्जन नेता अपने बीवी-बेटों को टिकट दिलाने के लिए सारे दावपेंच आजमाने में नहीं हिचक रहे हैं।

लोकसभा चुनाव के तारीखों ऐलान हो चुका है, राज्य की 29 सीटों के लिए मतदान तीन चरणों में होना है। पिछले चुनाव में राज्य में भाजपा व कांग्रेस में कांटे की टक्कर रही थी। यही कारण था कि भाजपा ने 16 और कांग्रेस ने 12 स्थानों पर जीत दर्ज की थी।

पिछले लोकसभा चुनाव से इस बार हालात जुदा है, भाजपा लगातार तीसरी बार जीत कर राज्य में सरकार बनाने में सफल हुई है, वहीं भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को घोषित कर चुनाव प्रचार का जोरदार अभियान चला रखा है। भाजपा को राज्य में भी पिछले चुनाव से बेहतर नतीजों की उम्मीद है। इसी उम्मीद ने भाजपा के नेताओं को अपनों को चुनाव मैदान में उतारने की लालसा जगा दी है।

लोकसभा चुनाव में संभावित बढ़त के मद्देनजर भाजपाई अपने परिजनों के लिए बिसात पर मोहरे चलने लगे हैं। कई मंत्री और नेता अपने बीवियों और बेटों को उम्मीदवार बनवाने की जुगत में लगे हैं।

पार्टी सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार के मंत्री भूपेंद्र सिंह अपनी पत्नी सरोज सिंह को सागर से, वित्तमंत्री जयंत मलैया अपनी पत्नी सुधा मलैया को दमोह से, कृषि मंत्री गौरी शंकर बिसेन ने अपनी पत्नी रेखा बिसेन की बालाघाट से दावेदारी ठोंकी है। इसी तरह पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव अपने बेटे अभिषेक को सागर या दमोह से चुनाव लड़ाने की जुगत में हैं।

शिवराज मंत्रिमंडल में बुंदेलखंड के सागर संभाग से तीन मंत्री हैं, ये तीनों मंत्री ही अपनों को टिकट दिलाने के लिए हर संभव दाव चल रहे हैं। भार्गव ने जहां बेटे के जरिए युवा को टिकट देने का दाव चला है तो वहीं भूपेंद्र सिंह व मलैया ने महिला कार्ड खेला है।

सरकार के मंत्रियों में अपने नाते रिश्तेदारों को उम्मीदवार बनाने के लिए चल रही लॉबिंग का मामला लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज तक पहुंचा तो वह भड़क उठीं। पार्टी के विधायक वीर सिंह पंवार ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ सुषमा स्वराज से मुलाकात कर मंत्री भूपेंद्र सिंह की पत्नी को सागर से उम्मीदवार बनाए जाने की मांग की तो उन्होंने तल्ख लहजे में कहा कि ऐसे में तो पूरी सरकार के मंत्रियों की पत्नियों को ही टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार देना चाहिए।

एक तरफ जहां राज्य सरकार के कई मंत्री नाते रिश्तेदारों को निर्वाचित जनप्रतिनिधि बनवाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं कई नेता अपने लिए सुरक्षित सीट की तलाश में लगे हैं। पार्टी के भीतर चल रहे द्वंद्व का ही नतीजा है कि राज्य की 29 सीटों में से एक पर भी भाजपा अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान नहीं कर पाई है। दूसरी ओर, कांग्रेस सहित बहुजन समाज पार्टी (बसपा) व समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने कई उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर चुकी है।

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर से लेकर मुख्यमंत्री चौहान तक यह दावा कर चुके हैं कि देश के साथ राज्य में भी भाजपा की हवा है और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अगली सरकार बनेगी। राज्य में भाजपा ने मिशन 29 भी चला रखा है।

वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया का मानना है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों परिवारवाद के मामले में एक सिक्के के दो पहलू हैं। इन दलों के नेताओं को अपने परिवार में ही योग्य लोग नजर आते हैं, यही कारण है कि पद, चुनाव व संगठन के जिम्मेदार पदों पर नेता अपने ही लोगों को बैठाना चाहते हैं ताकि राजनीति में अनुवांशिकता बनी रहे।

भाजपा में अगर मंत्री अपनों को उम्मीदवार बनाने में सफल रहे तो पार्टी के हाथ से कांग्रेस पर वार करने का वह हथियार छिटक जाएगा, जिसके चलते वह कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी बताकर प्रचारित करती रहती है।


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