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Film Review: धीमी और औसत है ‘मसान’


मुंबई,(एजेंसी)21 जुलाई। कई फिल्म समारोहों में धूम मचाने के बाद आखिरकार फिल्म ‘मसान’ सिनेमाघरों में रिलीज होने को तैयार है। मसान का मतलब ‘समय’ होता है, और समय के साथ-साथ होने वाली घटनाओं को इस फिल्म के माध्यम से दर्शाया गया है। अब क्या यह फिल्म आपको भी देखने के लिए विवश करेगी, आइए समीक्षा करते हैं।

फिल्म का नाम: मसान
डायरेक्टर: नीरज घैवन
स्टार कास्ट: ऋचा चड्ढा, विकी कौशल .श्वेता त्रिपाठी , संजय मिश्रा, सौरभ चौधरी
अवधि: 109 मिनट
सर्टिफिकेट: A
रेटिंग: 2.5 स्टार

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फिल्म ‘मसान’ का सीन

कहानी
इस फिल्म में बनारस शहर में गंगा के किनारे दो अलग-अलग कहानियों का समागम दिखाया गया है। एक तरफ देवी पाठक (ऋचा चड्ढा) अपने करीबी दोस्त की मृत्यु के जुर्म में फंस जाती हैं और उन्हें इससे उबारने के लिए पिता विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) हर कदम साथ देने को तैयार रहते हैं वहीं दूसरी तरफ डॉक्टर चौधरी (विनीत कुमार) को शालू गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) से प्यार है लेकिन उस प्यार में भी कई रुकावटें हैं। अब ये दोनों कहानियां एक दूसरे के साथ आगे बढ़ती जाती हैं और आखिरकार डायरेक्टर अपने हिसाब से निष्कर्ष निकालने की कोशिश करते हैं।

स्क्रिप्ट, अभिनय, संगीत
फिल्म की स्क्रिप्ट, फिल्म समारोहों के हिसाब से एकदम सही है लेकिन स्क्रीनप्ले काफी बड़ा है जिसकी वजह से रेगुलर रिलीज में इस फिल्म को देखना काफी मुश्किल होगा। फिल्म वैसे तो मात्र 109 मिनट की लगती है लेकिन एक वक्त के बाद बहुत लम्बी लगने लगती है। थोड़ी और क्रिस्प रखते तो शायद ज्यादा दिलचस्प नजर आती। कहीं कहीं तो सीन बहुत ही स्लो मोशन सा दिखता है। डायरेक्टर की कोशिश रहती है की आपको भावुक करें लेकिन वह भी सहज ढंग से नहीं हो पाता परन्तु संजय मिश्रा और ऋचा चड्ढा के कुछ ऐसे सीन हैं जो जरूर आपको सोचने पर विवश कर देते हैं। फिल्म में साइबर कैफे में घटने वाले कुछ हसी मजाक के सीन भी आपको हसते हैं।

अभिनय में एक बार फिर से ऋचा चड्ढा ने साबित कर दिया है की वो एक बेहतरीन अदाकारा है, हरेक सीन में वो खुद को बेहतर साबित करती हैं। वहीं संजय मिश्रा ने पिता के रूप में उम्दा काम किया है। इनके अलावा श्वेता त्रिपाठी और विनीत कुमार का भी एक्ट काबिल-ए-तारीफ है। हालांकि पंकज त्रिपाठी का कोई बड़ा रोल नहीं है लेकिन एक दफा उनकी भी बात पर हंसी आ ही जाती है। इस फिल्म से डेब्यू करने वाले विकी कौशल की एक्टिंग भी काफी आशाजनक है।

फिल्म का संगीत, खास तौर पर ‘मन कस्तूरी रे’ वाला गीत और बैकग्राउंड में चल रही धुन, मौके की नजाकत से इत्तेफाक रखती है।

क्यों देखें
अगर आपको फिल्म समारोह की संजीदा फिल्में काफी पसंद हैं और ज्यादा से ज्यादा वक्त सिनेमाघर की सीट पर बैठकर बीता सकते हैं, तो यह फिल्म आप जरूर देखें।

क्यों ना देखें
अगर आप कॉमर्शियल, कैंडी, मनोरंजन से भरपूर, पैसा वसूल सिनेमा की तलाश में हैं तो यह फिल्म आपके लिए नहीं बनी है।


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