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फर्जी जमानत दिलाने वाले गिरोह का पर्दाफाश, बड़ी संख्या में जाली दस्तावेज बरामद


लखनऊ,(एजेंसी)22 जुलाई। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की वजीरगंज पुलिस ने न्यायालय परिसर में सोमवार को घेराबंदी करके दो बदमाशों को गिरफ्तार करके अपराधियों को फर्जी जमानत दिलाने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया है। बदमाशों के कब्जे से विभिन्न थानेदारों समेत 71 अफसरों की मुहरें और बड़ी संख्या में जाली दस्तावेज बरामद हुए हैं। करीब दस साल से चल रहे फर्जी जमानत के खेल में कई वकीलों के साथ विभिन्न अदालतों के क्लर्कों के नाम उजागर हुए हैं।

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एसएसपी राजेश पांडेय ने बताया कि रविवार रात को सीरियल किलर सलीम के नाम पर रंगदारी मांगने वाले तीन अपराधियों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें राजकुमार उर्फ राजू गुप्ता एवं अनुराग निगर उर्फ विक्की निगम शामिल थे। इन आरोपियों ने बताया कि फर्जी दस्तावेज बनाकर जमानत कराने वाला गिरोह न्यायालय में सक्रिय है। गिरोह के लोगों को वह जानता भी है। उसने यह भी बताया था कि दीवानी कचहरी में बालाजी चैम्बर के पीछे फोटो स्टेट व चाय की दुकान के बगल में गिरोह के मास्टर माइंड चंद्रशेखर व राजेश पांडेय का आना जाना रहता है। पुलिस ने जब मामले की पड़ताल की तो उसके होश उड़ गए।

गिरोह का मास्टर माइंड चंद्रशेखर खुद ही करीब तीन सालों से वांक्षित था। कोर्ट ने गैंगस्टर के मामले में उसके खिलाफ एनबीडब्लू जारी किया था। लेकिन वह सिर्फ कागजों पर ही फरार था। फरारी की आड़ में वह कोर्ट परिसर में ही रहकर फर्जी दस्तावेज तैयार करने व अपराधियों की जमानतें दिलाने का काम कर रहा था।

पुलिस ने आरोपी चंद्रशेखर व उसके साथी राजेश पांडेय को गिरफ्तार और पूछताछ की तो अधिकारियों के पैरों तले जमीन खिसक गई। आरोपियों ने बताया कि वह आटो चालक, रिक्शा चालक व गरीब लोगों को रुपए का लालच देकर कचेहरी परिसर लाते थे और उनकी फोटो खींच लेते थे। इसके एवज में उन्हें दो सौ तीन सौ रुपए दे देते थे। इसके बाद गिरोह में शामिल कुछ टेक्निकल लोग जो कलर फोटोग्राफी अथवा स्कैनिंग किए हुए डीएल, पंजीयन प्रमाण पत्र, वोटर आईडी आदि उपलब्ध कराते थे। जिसके बाद फर्जी दस्तावेज तैयार कर अपराधियों की जमानत करा लेेते थे। आरोपियों ने पूछताछ में यह भी बताया कि इस धंधे में कई अधिवक्ता व बाबू शामिल हैं। जबकि नाका इलाके में रहने वाला गुप्ता नामक व्यक्ति डीएल, पंजीयन प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, खतौनी आदि लाकर देता था।

वहीं जुनैद नामक व्यक्ति स्कैन, कलर पंजीयन प्रमाण पत्र तथा वोटर आईडी मुहैया कराता था। जिसके बाद हम लोग दस्तावेजों पर फर्जी मोहरें व हस्ताक्षर कर देते थे। फिर इन्हीं दस्तावेजों के जरिए अधिवक्ता अपरोधियों की जमानत करा लेते थे।

पूछताछ में यह बात भी सामने आई है कि पिछले तीन सालों से इस धंधे में शामिल हुआ राजेश पांडेय इस गिरोह को आपरेट कर रहा था। उसके पास से 50 डीएल एवं मोहरें बरामद हुई हैं। जिसमें खाद्य एवं आपूर्ति अधिकारी लखनऊ, रजिस्टार एवं कानूनगो तहसील सदर, कर पंजीयन अधिकारी मोटर वाहन विभाग ट्रांस गोमतीनगर, लाइसेंसी एथार्टी एमवीएक्ट लखनऊ, भूलेख अनुभाग तहसीलदार सदर कानपुर सदर, प्रभारी कम्प्यूटर, जारीकर्ता तहसील बिल्हौर कानपुर नगर, सम्भागीय परिवहन अधिकारी क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय ट्रांसपोर्ट नगर लखनऊ, वाणिज्य अधिकारी महाप्रबंधक कार्यालय दूर संचार विभाग तथा आलमबाग, बाजारखाला, गुडंबा, काकोरी, महानगर, कृष्णानगर और उन्नाव जनपद के नवाबगंज, हसनगंज के अलावा कानपुर नगर के बिल्हौर, मूलगंज एवं अंय विभाग व थानों की मोहरें हैं।

पूछताछ में चंद्रशेखर व राजेश पांडेय ने बताया कि वह 20 हजार रुपए या उससे कम धनराशि की जमानत ही कराते थे। इन जमानतों में होने वाले सत्यापन पर ध्यान नहींं दिया जाता था जिसका फायदा उठाते थे। आरोपियों का कहना था कि सीबीआई, सीजेएम द्वितीय, एनडीपीएस और एसीजेएम-5 के यहां उनकी दाल नहीं गलती थी। आरोपियों का कहना था कि यहां मौजूद बाबू रुपए नहीं लेते थे और न ही तो फर्जी दस्तावेज लेते थे जिसके चलते यहां पर जमानत नहीं करा पाते थे।

आरोपी न्यायालय परिसर में स्थित वकार नामक व्यक्ति के साइबर कैफे से 50 रुपए में कोई भी एक खतौनी खसरा नंबर एवं नाम पते से निकलवा लेते थे। इनका प्रयोग जमानतनामे के साथ किया जाता था। आरोपियों ने बताया कि वह हर जमानत पर एक हजार से 12 सौ रुपए बाबू को देते थे। जो उनके इस गोरखधंधे में शामिल थे। आरोपी जो फर्जी दस्तावेज लगाकर जमानत याचिका दाखिल करते थे। उन पर कोर्ट की ओर से सत्यापन मांगा जाता था। लेकिन अधिवक्ता इन दस्तावेजों को संबंधित थाने न भेजकर आरोपियों को सौंप देते थे जो उन पर खुद ही सत्यापन कर थाने की फर्जी मोहरें लगाकर दे देते थे।

आरोपी एक ही नाम पते पर कई निर्वाचन कार्ड बनाते थे। उन पर अलग-अलग लोगों की फोटो लगाते थे। वहीं बाद में जब कोर्ट से इनका सत्यापन कराया जाता था तो न पता मिलता था उस नाम का कोई व्यक्ति। वर्ष 2015 में विभिन्न न्यायालय द्वारा आरोपियों के तारीख पेशी पर न आने के बाद उनके जमानतदारों के नाम व पते पर नोटिस भेजी गई। नोटिस पाकर लोग न्यायालय में पेश हुए जहां उन्होंने बताया कि उनके द्वारा कोई जमानत ही नहींं ली गई। जब जमानत के दस्तावेज देखे गए तो उनमें किसी दूसरे व्यक्ति की फोटो लगी हुई थी। जिसके बाद कोर्ट ने तथ्यों को संज्ञान में लेते हुए वजीरगंज थाने पर छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया।

राजेश पांडेय ने कुबूला कि वह प्रतापगढ़ के पूरे कन्हई थाने के गांव कठारे किशुनगंज बाजार का मूल निवासी है। 15 साल पहले उसने सिविल कोर्ट में कैंटीन खोली थी। इस बीच उसने तालकटोरा, कृष्णानगर व आलमबाग इलाके में लूट की वारदात अंजाम दी। पुलिस ने गिरफ्तार करने के साथ गैंगेस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की। फर्जी जमानत कराई और पेशी पर नहीं गया। कोर्ट ने वारंट जारी किए और वह कोर्ट में ही फर्जीवाड़ा करता रहा। चंद्रशेखर ने कुबूला कि वजीरगंज कोतवाली में उसके खिलाफ जालसाजी व धोखाधड़ी के तीन मुकदमे हैं। एसएसपी ने बताया कि फर्जी जमानत पर छूटे बदमाश जेल से निकलते ही अपराध शुरू कर देते हैं। पेशी पर लगातार गैरहाजिर रहने पर भी उन पर दबाव बनाना संभव नहीं होता।


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