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कभी मीर की महफिल सजती थी और आज…?


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नीलम/गरिमा,खबर इंडिया नेटवर्क- लखनऊ। मेरी हालत देखकर आपको मेरे दर्द का अंदाजा हो ही गया होगा, आज लोग मेरे किनारे से गुजरने से भी कतराते है मजबूरन अगर गुजरना भी पड़ा तो नाक पर रूमाल रखकर अपना रास्ता तय करते है।
मुझे ये दर्द खुदा ने नही बलिक इस बेरहम दुनिया ने दिया है, अब तो मुझे अपना नाम लेने और अपना इतिहास बताने में भी शर्म महसूस होती है। मै शीश महल तालाब आज एक तालाब न रहकर कूड़ेदान में तब्दील हो गयी हूँ, एक समय था जब मेरे बीचो बीच बने चबूतरे पर बैठकर मीर तकी मीर अपनी शायरी से महफिलें गुलजार किया करते थे और मैं सौदर्य और शांति का प्रतीक हुआ करती थी इठलाती, बलखाती, स्वच्छ सफेद निर्मल… लोग शांति ढूढ़ने मेरे किनारे पर आ पहुचते थे।
समय बदला और समय के साथ मुझमें भी बदलाव आया और मैं तालाब से कूड़ेदान में बदल गयी। लोगों ने अपने घर के सीवर का निकास भी तालाब में ही करवा दिया।
मेरी इस दशा को देखकर दौलतखाने के मीर जाफर अब्दुल्लाह और भाजपा के संसद सदस्य लालजी टंडन ने 2004 में मेरी स्वच्छता का बीड़ा उठाया, दोनो ने ही अपना श्रम दान दिया।
लेकिन मुझे किसी सरकार के मदद की दरकार नही है। मेरी खूबसूरती को जिन्होने मिलकर बिगाड़ा है केवल वही इसे सुधार सकते है, जिन लोगों ने मेरे अस्तित्व को मिटाने की भरसक कोशिश की है सिर्फ और सिर्फ उनकी कोशिश ही मुझे इस गुमनामी की जिंदगी से बाहर निकाल सकती है।
हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने मुझे और मुझ जैसे कर्इ तालाबों में दोबारा जिंदगी फूकने के लिये सात करोड़ के बिल को पारित किया है पर मै ये चाहती हूँ कि मेरी जिंदगी मुझे वहा के बाशिंदे ही लौटाये ताकि मै एक बार फिर जी उठूँ और कम से कम कोर्इ नाक पर रूमाल रखकर मुझे कोसता हुआ ना निकले।


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