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लखनवी तहज़ीब, गिरता ग्राफ


 

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प्रियांषु गुप्ता/खबर इंडिया नेटवर्क,लखनऊ

नाम – सतेन्द्र,उम्र – करीब 35 ,बर्ताव में निहायत सौम्य।  यह संक्षिप्त ब्योरा है एक निम्नवर्गिय लखनऊ निवासी का। अक्सर सुनने में आया कि लखनऊ अपनी तहज़ीब भूलता जा रहा है। बीते ढ़ाई सालों में कई बार यह महसूस भी हुआ। कई बार वाहन चालकों से लेकर सड़क किनारे खोमचे वाले तक जहरे-जुबान बोलते मिले। यही नज़ाकत है? सवाल कौंधा, लेकिन जवाब सामने था।

लौटते हैं सतेन्द्र पर। वह टैक्सी चलाते हैं। लेकिन भाषाई बुनावट दिल में उतर जाने जैसी। प्रायः मामूली किराऐ को लेकर झगड़ने वाले टैक्सी चालकों के लिए वह नज़ीर हैं।

किसी सवारी ने किराया कम दिया तो आप नहीं भड़के? यह सवाल पूछने पर बड़ी शालीनता से बोलते हैं- “दो-चार पैसों के लिए कहां तक झगडूं?। उनका ईमान। और इनसें झगडूं, तो, उनसे (पुलिस) क्यों नहीं?  कथित किराया दिखाकर कहते हैं- “वह तो इतना भी नहीं देते।”

सतेन्द्र की बातें दो तरफ इशारा करती हैं। अव्वल पुलिसिया घमण्ड और दूसरी लोगों के बर्ताव पर। अलबत्ता जरूरी नहीं कि उक्त दोनों लखनवी ही थे। लेकिन उन्हें पता तो था ही कि वे लखनऊ में हैं। यहां ऐसे बर्ताव की रव़ायत नहीं। हालांकि यह कह पाना लखनऊ के लिए अब चुनौती है। बदस्तूर बदहाल होती एक भयावह चुनौती।

कहते हैं कि लंदन के बाद लखनऊ ही अकेला ऐसा शहर है जहां जैसी शिष्टता किसी दूसरी जगह पाना दुर्लभ है । एक अजनबी सलाम भी यहां माकूल तवज्जो पाता है। लेकिन विडम्बना देखिऐ, आज लखनऊ की यह खासियत हाशिये पर है। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि दुनिया जिसकी पहचान जिस खूबी से करती हो, लोग उसी का गला घोटने को आमादा हैं।

सभ्यताऐं चंद दिनों में नहीं फलती। मियाद लगती है। इसे समझने में नवोदित लखनऊ को आखिर कितना समय लेगा, कह पाना मुश्किल है। शहर की तमाम नामचीन इमारतें बदहाल हो चुकी हैं। कारण- रखरखाव न होना। ऐसा ही खतरा अब शहरे-तहजीब पर है। समय है, सम्हलिऐ।

तहज़ीब का असल मतलब क्या है, मीठी जबान या बदहाल विरासत पर जार-जार आंसू महज? जवाब हां भी है और नहीं भी। लखनवी गलियों का अलग ही रूत्बा रहा है। गलियां जितनी पुरानी मोहकता उतनी अधिक। हालांकि अब कुछ चीजें यहां नहीं मिलती। मसलन, फरिश्तों के पते वगैरा। सड़कें बदहाल, शासन दोषी। बिजली नही आती शासन दोषी। उफनाते सीवरों के लिऐ भी शासन दोषी। लेकिन बदनुमा होती विरासत, अदब, तहज़ीब व फरिश्तों के पलायन इत्यादि का कारण कौन? दोषी कौन? सवाल सीधा है। सुनवाई शुरू हो।

 


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