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मसौदा अप्रसिद्ध स्वराज का


Swaraj-by-Arvind-Kejriwal

प्रियांशु गुप्ता-खबर इंडिया नेटवर्क,लखनऊ।    (किताब चर्चा) बेशक अरविंद केजरीवाल आज एक परिचित नाम बन चुके हैं। अन्ना की अगुवार्इ में व्यवस्था परिवर्तन की छेड़ी गर्इ केजरीवाल व साथियों की मुहिम भले जिस भी मुकाम पर खड़ी है, सर्वविदित है। लिहाजा, एक चीज की गुमनामी जरूर चौंकाती है – केजरीवाल की पुस्तक स्वराज। स्वराज पढ़ने के बाद जेहन में ऐसे सवाल का उठना स्वाभाविक भी है। अन्ना और केजरीवाल का संयुक्त आंदोलन व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर क्या लाना चाहता था, स्वराज उसी का मेनोफेस्टो है।
अन्ना हजारे से अलग (अलगाव) होने के बाद केजरीवाल स्वराज के इरादों पर कहां तक खरे उतरे हैं? व्यवस्था परिर्वतन अराजकता नही है, कैसे? आम आदमी पार्टी की बुनियाद क्या है़? इस जैसे कर्इ जवाब स्वराज बेहद आसान भाषा में देती है।
बापू का लोकप्रिय मंत्र- ‘सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए बीस लोग नहीं चला सकते। सत्ता के केंद्र बिंदु दिल्ली, बंबर्इ और कलकत्ता जैसी राजधानियों में हैं। मैं उसे भारत के सात लाख गांवो में बांटना चाहूंगा।’ स्वराज काफी हद तक उक्त मंत्र का ही अनुकरण है। हालांकि, 1909 में लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर बैरिस्टर गांधी द्वारा लिखित ‘हिंद स्वराज’ से केजरीवाल की ‘स्वराज’ काफी अलहदा है। इस बात की पुष्टि पाठक उपरोक्त किताबों की प्रस्तावना पढ़ ही कर सकते हैं।
स्वराज क्या है? किताब के 52वें सफे पर केजरीवाल लिखते हैं-‘क्या इसी को हम जनतंत्र (स्वराज) कहेंगे कि पांच साल में एक बार वोट डालो और उसके बाद अपनी जिंदगी इन नेताओं और अफसरों के हाथ में गिरवी रख दो।’ फिर होना क्या चाहिए? वह आगे लिखते हैं-‘अब ये पांच साल में एक बार वोट डालने की राजनीति नहीं चलेगी। अब सीधे-सीधे जनता को सत्ता में भागीदारी चाहिए। जनता निर्णय ले और अफसर उन निर्णयों का पालन करें।’ मगर कैसे? गांव में ग्राम सभा व शहर में मोहल्ला सभा की हिमायती स्वराज कहती है-‘ग्राम व मोहल्ला सभा को मुक्त फंड में धन वितरण किया जाए यानी सभा को पैसा ‘योजनाओं का नहीं’, ‘योजनाओं के लिए’ दिया जाए। योजनाऐं स्वयं जनता बनाए। उसे क्या चाहिए, फैसला स्वयं जनता करे।’ लेकिन अचानक इतना व्यापक बदलाव कैसे? क्या आजादी के बाद एक भी योजना सफल नही हुर्इ? इस का जवाब, स्वराज बेहद चतुरार्इ से देती है।
क्या अन्ना-केजरी के सपनों का भारत संभव है? महाराष्ट्र के हिवरे बाजार गांव को अपवाद की ऐनक से न देखें, तो वाकर्इ यह संभव दिखार्इ पड़ता है। पुस्तक में भ्रष्टाचार, जनलोकपाल, वालमार्ट का विरोध, वर्तमान पंचायती राज की विसंगतियां, भूमि अधिग्रहण, सरकारी फंड पर नियंत्रण व प्राकृतिक संसाधनों की लूट जैसे अपरिहार्य मुददों पर संक्षिप्त लेकिन सटीक विश्लेषण हुआ है।
खैर, किताब की सबसे बड़ी खामी है वर्तमान में अन्ना व केजरी के पृथक रास्ते। अलबत्ता, स्वराज में लोकसेवा का उददेश्य तो महत्तवपूर्ण है, लेकिन सिर्फ उददेश्य ही सबकुछ नहीं होता। उददेश्य की पहचान उसकी सफलता तय करती है। योजनाओं में दिलचस्पी रखने वालों के लिए स्वराज एक रोचक पुस्तक है।
नाम – स्वराज
लेखक – अरविंद केजरीवाल
प्रकाशक – हार्पर कॉलिंस पबिलशर्स इंडिया
मूल्य – :125


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