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गांधी-नेहरू परिवार की ‘आंधी’ में उड़ चुके हैं बड़े-बड़े धुरंधर


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अमेठी,एजेंसी-27 मार्च। अमेठी में गांधी नेहरू परिवार की आंधी में अच्छे अच्छों को चुनावी रण में कोई खास मुकाम कभी भी हासिल नहीं हुआ। गांधी नेहरू परिवार को अमेठी के सियासी कुरुक्षेत्र में जिस किसी ने भी चुनौती देने की कोशिश की अमेठी ने उसे सिरे से नकार दिया। जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव से लेकर बसपा के संस्थापक काशीराम तक की अमेठी के चुनावी रण में जमानत जब्त हो चुकी है।

गांधी नेहरू परिवार के मुकाबले अब तक अमेठी में किसी भी सियासी दल के योद्धा की जमानत नहीं बच पाई है। 1977 में पहली बार गांधी नेहरू परिवार से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पुत्र संजय गांधी अमेठी के रास्ते चुनावी समर में उतरे तो देश के साथ ही विदेशी मीडिया की नजरों में भी अमेठी अहम सीट हो गई। 1976 से शुरू हुआ गांधी नेहरू परिवार का अमेठी के साथ पारिवारिक रिश्ता दिनों दिन मजबूत होता गया। गांधी नेहरू परिवार के छोटे पुत्र संजय गांधी के निधन के बाद 1981 में हुए उपचुनाव में भाई की सीट से परिवार के बड़े बेटे राजीव गांधी ने नामांकन किया। राजीव गांधी को शिकस्त देने के लिए संयुक्त विपक्ष ने जनता दल यू के शरद यादव को अपना प्रत्याशी बनाया। राजीव गांधी जहां रिकार्ड मतों से विजयी हुए वहीं शरद यादव महज दस फीसद वोट ही हासिल कर पाए।

1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी को घेरने के लिए जनता दल व भाजपा के संयुक्त प्रत्याशी के रूप में राजमोहन गांधी राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है के नारे के साथ चुनावी समर में उतरे। वहीं बसपा के टिकट पर कांशीराम भी राजीव गांधी को अमेठी के रण में चुनौती देने उतरे। राजमोहन गांधी को 17.21 फीसद मत हासिल हुए तो कांशीराम महज 25,400 वोट ही पा सके। जबकि राजीव गांधी को 67.43 फीसद मत मिले। काशीराम के साथ ही इस चुनाव राजमोहन गांधी की भी जमानत जब्त हो गई। वहीं राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी के चुनावी समर में 2004 व 2009 में ताल ठोंकने वाले सूरमा भी अपनी जमानत नहीं बचा सके।


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