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उप्र : आजमगढ़ में रमाकांत के सामने गढ़ बचाने की चुनौती


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लखनऊ/आजमगढ़-एजेंसी 1 अप्रैल। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया मुलायम सिंह यादव पूर्वाचल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लहर को बेअसर करने के उद्देश्य आजमगढ़ सीट से चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। लेकिन, मुलायम के फैसले से आजमगढ़ से कद्दावर यादव नेता और भाजपा से सांसद रमाकांत यादव के सामने अपना गढ़ बचाने की चुनौती उत्पन्न हो गई है। साथ ही मुलायम की नजर आजमगढ़ के अलावा आसपास की लोकसभा सीटों पर भी है। इस बीच, उलेमा परिषद (काउंसिल) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर इरशादी मदनी ने इसी सीट से सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के खिलाफ ताल ठोंकने का ऐलान कर दिया है, जिससे सपा मुखिया की मुश्किलें बढ़ती दिखायी दे रही हैं। इरशादी के ऐलान के बाद से ही मुलायम ज्यादा सक्रिय हो गये हैं। आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर रमाकांत यादव सांसद हैं और लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी भी हैं। वैसे भी, आजमगढ़ में रमाकांत को हराना आसान नहीं है। ऐसे में जब मौलाना आमिर इरशादी खुद चुनाव लडें़गे, तो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के मनसूबों पर पानी फिर सकता है और आजमगढ़ सीट जीतना अधूरा ख्वाब हो सकता है।
रमाकांत यादव पहले सपा में ही थे। बाद में परिस्थतियों को भांपकर उन्होंने बसपा का भी दामन थामा और अब वह भाजपा के प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे हैं। उनकी छवि क्षेत्र में दबंग नेता की है और यादवों में उनकी काफी पैठ मानी जाती है। कहा जाता है कि जिले में यादवों में सर्वमान्य नेता भी वही हैं। यही कारण है कि उनके खिलाफ मुलायम के सिवाय किसी अन्य ने लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई।मुलायम सिंह ने यहां से वरिष्ठ सपा नेता व कैबिनेट मंत्री बलराम यादव और दुर्गा प्रसाद यादव को चुनाव लड़ने के लिए कहा था, लेकिन दोनों नेताओं ने रमाकांत यादव के खिलाफ लड़ने की हिम्मत नहीं दिखाई।पिछले लोकसभा चुनाव में रमाकांत भाजपा के टिकट पर ही मैदान में थे और वह 2,47,300 मतों से विजयी रहे थे। लेकिन, इस बार उनके ही गढ़ में उतरकर सपा मुखिया ने उन्हें तगड़ा झटका दिया है।रमाकांत यादव 1996 और 1999 में सपा, 2004 में बसपा और 2009 में भाजपा के टिकट पर संसद भवन पहुंच चुके हैं।
सपा इस सीट से अपने मुखिया को लड़ाकर एक साथ दो निशाना लगाना चाहती है। पहला पूर्वाचल में मोदी का असर कम होगा और दूसरे मुलायम के छोटे बेटे प्रतीक के लिए यहां राजनीतिक मैदान तैयार हो जायेगा। आजमगढ़ से मुलायम के ताल ठोंकने पर यादव मतदाता असमंजस में पड़ गये हैं। उनके मन में दोनों ही नेताओं के प्रति सम्मान है।स्थानीय पत्रकार इखलाक अहमद कहते हैं, “मुलायम के उतरने से समीकरण तो बदले ही हैं। बसपा ने भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है, तो उलेमा परिषद के अध्यक्ष इरशादी के मैदान में आने से पेंच फंस गया है।”अहमद कहते हैं, “यदि मुसलमानों का वोट तीन भागों में बंटता है, तो इसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा। यादवों में रमाकांत की अच्छी पैठ मानी जाती है। हालांकि, मुलायम खुद बड़े नेता हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर उनके सामने चुनौती तो है ही।”माना जाता है कि इस क्षेत्र में रमाकांत को पिछड़ों औैर दलितों का समर्थन भी हासिल है। इसलिए, उनको हराना आसान नहीं होगा। वह चाहे जिस दल से लड़ें, संसद भवन में उनकी सीट पक्की होती हैं। इस बार मुलायम सिंह के साथ भिड़ंत होने से उनकी सीट फंसती नजर आ रही है।


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