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फूलपुर में नेहरू की विरासत बचाने की चुनौती


Kaif
फूलपुर,एजेंसी-3 अप्रैल।                      ‘तीन दशक से कांग्रेस के हिस्से में आ रही है हार’
उत्तर प्रदेश की संगम नगरी इलाहाबाद से सटा फूलपुर संसदीय क्षेत्र देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का गढ़ रहा है। लेकिन आज नेहरू की विरासत संभालने वाला एक भी लायक नेता फूलपुर में नहीं बचा है। तीन दशक बाद कांग्रेस को मोहम्मद कैफ के सहारे फिर से यहां पांव जमाने की आस बंधी है, तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय में इस सीट पर जीत हासिल करने में नाकामयाब हुई भाजपा इस बार मोदी लहर के सहारे इस सीट को अपने पक्ष में करने की कोशिश में है। नेहरू के गढ़ में लोकसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछ चुकी है और मोहरे भी तैयार हैं। वर्ष 1984 के बाद यह सीट गंवा चुकी कांग्रेस ने इस बार पूर्व क्रिकेटर मोहम्मद कैफ पर दांव लगाया है। कैफ की लोकप्रियता के सहारे कांग्रेस इस बात की उम्मीद लगाए बैठी है कि लोग इस बार धर्म और जाति के बंधनों से ऊपर उठकर मतदान करेंगे और तीन दशक बाद फिर एक बार यहां कांग्रेस का झंडा फहरेगा। कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, कैफ एक बेहतर प्रत्याशी हैं और वह स्थानीय भी हैं। लोग धर्म, जाति और मजहब से ऊपर उठकर उनके पक्ष में मतदान करेंगे और पार्टी इस सीट पर जीत हासिल करेगी। दूसरी ओर विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) के करीबी और विधायक केशव प्रसाद मौर्य इस बार भाजपा उम्मीदवार के रूप में फूलपुर से चुनाव मैदान में हैं। मौर्य को मोदी लहर के सहारे फूलपुर में फूल खिलाने का भरोसा है। भाजपा ने पार्टी नेता सिध्दार्थनाथ सिंह और नरेंद्र सिंह गौर को नजरअंदाज कर मौर्य को टिकट दिया है।
समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस सीट से धर्मराज पटेल को उतारकर लड़ाई दिलचस्प बना दी है। पुराने सपा नेता को मैदान में उतारकर पार्टी एक बार फिर नेहरू के गढ़ में सेंध लगाने की फिराक में है। इधर, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने वर्तमान सांसद कपिल मुनि करवरिया पर भरोसा जताया है। फूलपुर संसदीय सीट से पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लगातार 1952, 1957 और 1962 में जीत दर्ज कराई थी। नेहरू के विजय रथ को रोकने के लिए प्रख्यात समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया खुद फूलपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे, लेकिन वे नाकामयाब रहे थे। नेहरू के निधन के बाद इस सीट की जिम्मेदारी विजय लक्ष्मी पंडित ने संभाली और उन्होंने 1967 के चुनाव में जनेश्वर मिश्र को हराकर कांग्रेस का झंडा फूलपुर में बुलंद रखा। आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में हालांकि कांग्रेस को यह सीट गंवानी पड़ी और 1980 में कांग्रेस की लहर के बावजूद यह सीट कांग्रेस के खाते में नहीं आ पाई।


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