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कोयला ब्लॉक : 1993 के बाद सभी आवंटन अवैध


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नई दिल्ली,एजेंसी-26 अगस्त। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को दिए गए एक फैसले में कहा कि 1993 और उसके बाद से कोयला ब्लॉक का स्टीयरिंग समिति से और सरकारी डिस्पेंसेसन (छूट) मार्ग से आवंटन अवैध, स्वेच्छाचारी और अपारदर्शी है, इनकी कोई निश्चित शर्ते नहीं थीं। अदालत ने हालांकि इन आवंटनों को रद्द नहीं किया।
न्यायमूर्ति आर.एम. लोढ़ा, न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ की एक पीठ ने अपने फैसले में कहा, 14 जुलाई 1993 से 36 बैठकों में स्टीयरिंग समिति की सिफारिशों और सरकरी डिस्पेंशन मार्ग से हुआ आवंटन स्वेच्छाचारिता और वैधता की त्रुटियों से ग्रस्त है।
फैसला सुनाते हुए न्यायमूर्ति लोढ़ा ने कहा कि तुलनात्मक गुणों के मूल्यांकन की कोई निश्चित शर्त नहीं थी।
फैसले में कहा गया, कार्य करने का तरीका लापरवाही भरा था। कोई उचित और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं थी। जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय संपत्ति का अनुचित वितरण हुआ। इस तरह से जनहित का भारी नुकसान हुआ।
वकील एम.एल. शर्मा और गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) कॉमन कॉज ने याचिकाओं के जरिए आवंटन की वैधता को चुनौती दी थी और इन्हें खारिज करने की मांग की थी।
अदालत ने जिस प्रकार 2जी मामले में सभी लाइसेंस को रद्द कर दिया था, उस तरह से इस मामले में आवंटन रद्द नहीं किए।
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए एक सितंबर की तिथि मुकर्रर की और कहा, जैसा कि स्पष्ट है कि स्टीयरिंग समिति मार्ग और सरकारी डिस्पेंसेसन मार्ग से हुए आवंटन स्वेच्छाचारी और अवैध थे, अब इसक परिणाम क्या होगा यह मुद्दा विचारणीय है। हमारा मानना है कि इस सीमित दायरे में मामले की और सुनवाई की जरूरत है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में एक तरीका यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जाए। इस समिति की रिपोर्ट से अदालत यह देखेगी कि आवंटन के क्या-क्या विकल्प थे।
अदालत ने कहा कि जैसा कि देखा गया कि पूर्व महान्यायवादी आंकड़े दे पाने में असमर्थ रहे और जो भी आंकड़े सामने आए उस पर राज्य सरकारों को आपत्ति थी।
अदालत ने 1993 से 2010 के बीच 36 बैठकों में चयन समिति द्वारा अपनाए गए लापरवाही पूर्ण रवैए की ओर इशारा करते हुए कहा, “चयन समिति कभी एक ढर्रे पर नहीं चली, उसने पारदर्शिता नहीं अपनाई, समुचित विचार करके काम नहीं किया गया, शायद ही कभी उसने प्रासंगिक तथ्यों के आधार पर फैसला किया, कोई पारदर्शिता नहीं अपनाई गई और दिशा-निर्देश से शायद ही कभी दिशा ली गई।
अदालत ने कहा कि समिति की सिफारिश पर हुआ आवंटन भी अवैध था और सरकारी डिस्पेंसेशन मार्ग से हुआ आवंटन भी अवैध था, क्योंकि कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम-1973 के तहत इसकी अनुमति नहीं थी।
राज्य सरकारों या उसके उपक्रमों को हुए कुछ आवंटन के बारे में अदालत ने कहा कि कोई भी सरकार या उनकी सार्वजनिक कंपनियां वाणिज्यिक मकसद से खनन के लिए योग्य नहीं हैं।
अदालत ने कहा, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए और हम करना चाहते हैं कि हमारे सामने उन कोयला ब्लॉकों के संदर्भ में कोई चुनौती नहीं दी गई है, जिनमें अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट (यूएमपीपी) के लिए बिजली के न्यूनतम किराए के लिए प्रतिस्पर्धी बोली लगाई गई थी।
अदालत ने कहा, यह निर्देश दिया जाता है कि यूएमपीपी को आवंटित कोयला ब्लॉक का उपयोग सिर्फ यूएमपीपी के लिए ही होगा और वाणिज्यिक उत्खनन के लिए इजाजत नहीं दी जाएगी।


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