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यूपी में ब्राह्मण वोटर जिसके साथ गया, उसकी बनी सरकार


अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा ने बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में अपना समर्थन दिया है. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में महासभा के अध्यक्ष राजेंद्र नाथ त्रिपाठी ने समर्थन का ऐलान किया.

समर्थन हासिल कर बसपा ये संदेश देने की कोशिश कर रही है कि सिर्फ दलित और मुसलमान ही नहीं बल्कि सवर्ण भी उसे साथ हैं. वह सभी वर्गों का समर्थन हासिल कर किसी तरह चुनाव जीतने की जुगत में है.

अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा ने बहुजन समाज पार्टी के पक्ष में अपना समर्थन दिया है. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में महासभा के अध्यक्ष राजेंद्र नाथ त्रिपाठी ने समर्थन का ऐलान किया.

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता को लेकर कोई भी दल आज तक खुशफहमी नहीं पाल सका है कि ये वोट बैंक उसका है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण को यह डिसाइडिंग शिफ्टिंग वोट कहा जाता है.

कारण ये है कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव गवाह हैं कि यूपी में सभी जातियों की तरह ब्राह्मण कभी एकजुट होकर मतदान नहीं करता. कई वैचारिक तौर पर अपने करीब जिस पार्टी को समझते हैं, उसे वोट देते हैं. वहीं कई जीतनेवाली पार्टी के पक्ष में होते हैं क्योंकि वे जीतने वाले के साथ रहना चाहते हैं.

प्रदेश में ब्राह्मण संख्या के लिहाज से दलित, मुस्लिम से कम माने जाते हैं. लेकिन फिर भी ये करीब करीब 14 फीसदी माने जाते हैं, जो कि कम नहीं है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में 25 से 30 फीसदी वोट हासिल कर सरकार बनती रही है. उत्तर प्रदेश के मध्य और पूर्वांचल के करीब 29 जिलों में इनकी भूमिका अहम मानी जाती है. वहां ब्राह्मणों के पास जमींदारी रही है.

इनका प्रभाव प्रदेश की कई ऐसी सीटों पर भी देखने को मिलता है, जहां इनकी तादाद कम है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण अभी भी समाज के विभिन्न वर्गों को प्रभावित करने में सफल होते हैं. ये सोच विचार कर वोट देने वाले होते हैं. जातिगत गणना पर नजर जरूर रखते हैं, लेकिन वोट ये जातीय आधार पर नहीं डालते. यह डिसाइडिंग शिफ्टिंग वोट है. पिछले कुछ चुनाव इसका उदाहरण हैं कि ये जिसके भी साथ जाता है, सरकार उसकी बनती है.

2007 में प्रदेश में ब्राह्मणों को बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को स्वीकार करते हुए देखा. लेकिन 2009 में यही ब्राह्मण कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गए और कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव में जोरदार प्रदर्शन किया.

90 के दशक में ब्राह्मण समुदाय ने भाजपा को काफी समर्थन दिया लेकिन पिछले कुछ विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो भाजपा का ब्राह्मण वोट सिकुड़ता गया है. वर्ष 2002 में यह करीब 50 प्रतिशत था. 2007 में यह 44 प्रतिशत पर आ गया और 2012 में यह मात्र 38 प्रतिशत पर रह गया था. इसके अलावा उत्तर प्रदेश में बाकी के ब्राह्मण मतदाता दो बड़ी पार्टियों में बंट जाते हैं. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाजवादी पार्टी को 20-20 प्रतिशत वोट मिलता है.

चुनावों में ब्राह्मण प्रत्याशियों की जीत की बात करें तो 1993 में भाजपा से सबसे ज्यादा 17 ब्राह्मण विधायक जीते, 19 साल बाद 2012 महज 6 की संख्या में सिमट गए. वहीं 90 के दशक में ब्राह्मण प्रत्याशियो को ज्यादा तरजीह नहीं देने वाली बसपा ने 2007 में सोशल इंजीनियरिंग की और उसके सबसे ज्यादा 41 ब्राह्मण प्रत्याशी विधायक बने. लेकिन इसके बाद 2012 के चुनाव आते—आते ब्राह्मणों का बसपा से मोहभंग हुआ. यही कारण था कि इस चुनाव में बसपा के महज 10 ब्राह्मण प्रत्याशी जीत सके, जबकि समाजवादी पार्टी के 21 ब्राह्मण प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुंचे.

यूपी में पार्टियों के ब्राह्मण विधायक

1993

भाजपा- 17

बसपा- 00

सपा- 2

कांग्रेस- 5

अन्य- 2

कुल- 24

1996

भाजपा- 14

बसपा- 2

सपा- 3

कांग्रेस- 4

अन्य- 2

कुल- 25

2002

भाजपा- 8

बसपा- 4

सपा- 10

कांग्रेस- 1

अन्य- 2

कुल- 25

2007

भाजपा-3

बसपा- 41

सपा- 11

कांग्रेस- 2

अन्य-0

कुल- 58

2012

भाजपा- 6

बसपा- 10

सपा- 21

कांग्रेस- 3

अन्य- 1

कुल- 41


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