Home >> Breaking News >> उत्तर प्रदेश से क्यों कतराते हैं उद्योगपति व उद्यमी?

उत्तर प्रदेश से क्यों कतराते हैं उद्योगपति व उद्यमी?


uttar_pradesh
रतन मणि लाल , खबर इंडिया नेटवर्क। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद से मुख्य मंत्री व प्रदेश के बड़े अधिकारी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि प्रदेश उद्योग निवेश के लिए पसंदीदा लक्ष्य बन गया है और देश-विदेश के तमाम बड़े उद्योग प्रदेश में उद्योग लगाने के लिए उत्सुक हैं। प्रदेश में बड़े उद्योग और अवस्थापना से जुड़े निवेश में आई टी सिटी, एक्सप्रेसवे, और लखनऊ में रेडियो टैक्सी और मेट्रो परियोजना प्रमुख हैं।
लेकिन जमीनी हालत कुछ और ही बयान करती है। कानून व्यवस्था, सरकारी सहयोग, निर्णय लेने में लिए जाना वाला लम्बा समय और नीतिगत अड़चने उत्तर प्रदेश को आकर्षक निवेश स्थल बनाने से रोक रही हैं।
आई टी क्षेत्र
लखनऊ के निकट चक गजरिया में आई टी सिटी की योजना के लिए तमाम प्रयासों और विज्ञापनों के बावजूद एक ही कंपनी ने यहाँ स्थापना करने में रूचि दिखाई है।
नवम्बर के अंतिम सप्ताह में लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम ‘ई-उत्तर प्रदेश’ में यूपी के मुख्य सचिव जावेद उस्मानी और अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास आयुक्त आलोक रंजन ने सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कंपनियों को नोएडा व ग्रेटर नोएडा से इतर लखनऊ, आगरा व इलाहाबाद में निवेश का न्योता दिया। सरकार की नई आइटी नीति का भी खूब बखान हुआ लेकिन कार्यक्रम में शिरकत करने वाले आइटी कंपनियों के प्रतिनिधियों का मानना है कि आइटी में निवेश, शिक्षा व बुनियादी सुविधाओं में किए निवेश के पीछे-पीछे आता है।
प्रदेश के मुख्य मंत्री उद्योग निवेश को कितनी गम्भीरता से लेते हैं यह तो इसी से साफ़ हो गया कि निर्धारित कार्यक्रम के बावजूद अखिलेश यादव इस कार्यक्रम में नहीं आये । इसके बजाये उन्होंने राजस्थान में चुनावी रैली के लिए जाना ज्यादा जरूरी समझा। आज हाल यह है कि राजस्थान में तो पार्टी को कुछ हासिल हुआ नहीं, उलटे तमाम आई टी कंपनियों को अब उत्तर प्रदेश सरकार की मंशा पर ही शक होने लगा है।
साफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसाफ्ट इंडिया के प्रबंध निदेशक करन बाजवा ने कहा कि आइटी कंपनिया वहा निवेश करती हैं, जहा बाजार व बेहतरीन अवस्थापना सुविधाओं के साथ स्थानीय स्तर पर भी डिजिटल कनेक्टिविटी और दक्ष मानव संसाधन उपलब्ध हो। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आइटी क्षेत्र में निवेश के लिए यह जरूरी कारक अन्य शहरों में भी हों।
कंप्यूटर प्रोसेसर बनाने वाली कंपनी एएमडी के डायरेक्टर व कंट्री मैनेजर विनय सिन्हा कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर अवस्थापना सुविधाएं, बिजली और शिक्षा के क्षेत्र में कदम निवेश के लिए असल मुद्दे हैं। यह नहीं हो सकता कि हम गोरखपुर में अनुसंधान केंद्र खोलें और उसे दक्षिण भारतीय लोगों से संचालित करायें। सरकार की नीति में पारदर्शिता, समयबद्धता व स्थायित्व भी होना चाहिए।
दक्षिण एशिया में इंटेल के सेल्स और मार्केटिंग ग्रुप की प्रबंध निदेशक देबजानी घोष कहती हैं कि छात्रों को लैपटॉप बाटना डिजिटल असमानता को खत्म प्रमुख विरोधी दल बीजेपी ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार के सहयोग से होटल ताज में आयोजित दो दिवसीय ‘ई उत्तर प्रदेश’ में पहले दिन न जाकर मुख्यमंत्री ने प्रदेश की छवि धूमिल की है। सरकारी घोषणा के बावजूद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्यक्रम में न पहुंचना सरकार की विकास के प्रति प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि इस आयोजन में मुख्यमंत्री के न रहने से प्रदेश में विकास की सम्भावनाओं पर जोरदार झटका लगा और सरकार की विकास के प्रति विश्वनियता कटघरे में खड़ी हो गयी।
एक्सप्रेसवे
बहु चर्चित आगरा एक्सप्रेसवे परियोजना में तो किसी निवेशक ने रूचि ही नहीं दिखलाई। निवेशकों की ओर से झटका खाने के बाद प्रदेश सरकार ने आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट को स्वयं ही पूरा करने का बीड़ा उठाया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की शीर्ष प्राथमिकताओं में शुमार इस परियोजना को जल्द शुरू करने की योजना है। अखिलेश सरकार ने दूसरे अनुपूरक बजट के जरिये आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे प्रोजेक्ट में भूमि अधिग्रहण के लिए 450 करोड़ रुपये रखे हैं।
रेडियो टैक्सी और मेट्रो
जोर शोर से शुरू की गयी लखनऊ रेडियो टैक्सी योजना शुरू होने के कुछ दिनों बाद ही लड़खड़ाती नज़र आ रही है क्योंकि इसके ड्राईवरों का कहना कि उन्हें वादे के मुताबिक वेतन नहीं दिया जा रहा। हाल यह है कि अधिकतर रेडियो टैक्सी सड़क से हट गयी हैं।
मेट्रो परियोजना से दिल्ली मेट्रो कारपोरेशन के हाथ खींच लिए जाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सामने इसे पूरा करने के लिए नए सहयोगी की जरूरत है और प्रदेश के विभागों और निगमों पर दबाव है कि वे इस योजना के लिए धन राशि योगदान करें।
क्यों उ प्र नहीं है पसंद
इस समय निवेश के लिए देश विदेश के उद्योग समूहों और उद्यमियों के लिए तमिल नाडु पहली पसंद है। चेन्नई स्थित राष्ट्रिय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2012 में व्यावसायिक स्थलों पर डकैती (जहां हथियारों का इस्तेमाल किया गया हो) या लूटपाट का एक भी मामला नहीं हुआ है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि राज्य में लोग कानून का उल्लंघन करने से डरते हैं और पुलिस की वर्दी का सम्मान करते हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनी के अधिकारीयों का कहना है कि पिछले 15 वर्ष से भी ज्यादा समय से राज्य में परिचालन करने के बावजूद अभी तक उनसे एक बार भी रिश्वत नहीं मांगी नहीं गई है। भूमि अधिग्रहण करने से लेकर संयंत्र स्थापित करने में करीब दो साल का वक्त लगता है। तमिलनाडु में संगठित कार्यबल और श्रमिक विवाद भी होते हैं लेकिन ऐसे मामलों में मध्यस्थता और समाधान भी बहुत तेजी से होता है। तमिलनाडु में कभी भी वैसा विवाद नहीं होगा जैसा कि आंध्र प्रदेश में हैदराबाद को लेकर हो रहा है क्योंकि आंध्र प्रदेश के सिर्फ एक ही शहर में निवेश हुआ है जबकि तमिलनाडु में ऐसे छह-सात शहर हैं। गुजरात में भी कारोबारियों के लिए सुविधाजनक माहौल होता है।
ऐसा लगता है कि तमिलनाडु को लेकर सत्तारूढ़ दल अन्ना द्रविड मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) और विपक्षी दल द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) के बीच एक द्विपक्षीय समझौता है। दोनों ही दलों की मजबूती उनके कार्यकर्ता हैं लेकिन वे सभी ज्यादातर समय एक दूसरे के रास्ते में नहीं आते हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती मायावती सरकार द्वारा शुरू की गई सभी परियोजनाएं या तो रोक दी गई या फिर मुलायम सिंह सरकार ने उन पर जांच बैठा दी। अन्नाद्रमुक और द्रमुक दोनों ही सांप्रदायिक हिंसा को लेकर बेहद सख्त रवैया अपनाती हैं।


Check Also

आत्मनिर्भर भारत के जिस अभियान पर हम निकले हैं, उसमें भी नारी शक्ति की बहुत बड़ी भूमिका है : PM मोदी

PM मोदी : दुष्कर्म की सजा से जुड़े कानूनों को बहुत सख्त किया गया है, …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *