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कांग्रेस में शुरू हुआ ‘राहुल बचाओ ‘अभियान’


नई दिल्ली,(एजेंसी) 04 सितम्बर । कांग्रेस की आंतरिक टीम ने महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों में भी पार्टी की हार होने का अनुमान जताया है। ऐसे में एआईसीसी में ‘टीम राहुल’ अब ‘राहुल बचाओ अभियान‘ की तैयारी में जुट गई है। इसे राहुल गांधी को आलोचकों से बचाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है। राहुल टीम जहां पार्टी हलकों में ‘साजिश फोबिया’‘ पर काम कर रही है, वहीं कांग्रेस प्रवक्ता ने बुधवार को कहा, ‘राहुल जी हमारे नेता हैं और बने रहेंगे। हम उनके नेतृत्व में लड़ेंगे और फिर सत्ता में आएंगे।’

Rahul-Gandhi

कांग्रेस के एक सीनियर नेता ने बताया, ‘पार्टी की कमजोर हालत को देखते हुए पार्टी में एकता सबसे अहम है। हालांकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि सोनिया जी पार्टी के व्यापत हितों को चुनती हैं या राहुल जी की टीम को।’
राहुल गांधी के बचाव से जुड़ा अभियान कांग्रेस के दर्जन भर जूनियर नेताओं के साथ शुरू हुआ। इन नेताओं को राहुल गांधी ने सचिव बनाया है। इन नेताओं ने तकरीबन 15 दिन पहले बैठकों का दौर शुरू किया था। यह अभियान उन कानाफूसियों के बीच शुरू हुआ कि राहुल के समर्थक लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद उनके खिलाफ पार्टी के कई नेताओं के साजिश रचने की आशंका जता रहे हैं।

ये तमाम बातें ऐसे वक्त में हो रही हैं, जब पार्टी के आंतरिक सर्वे में अक्टूबर में तीन राज्यों में पार्टी की हार का अंदेशा जताया जा रहा है। पार्टी सूत्रों ने बताया कि हरियाणा में पार्टी के चुनाव पूर्व आकलन के मुताबिक, सत्ताधारी पार्टी यानी कांग्रेस बीजेपी और इंडियन नेशनल लोकदल से पीछे यानी तीसरे स्थान पर रह सकती है। महाराष्ट्र को लेकर पार्टी का अंदरूनी आकलन कहता है कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को 70 सीटों से ज्यादा नहीं मिलेंगी। झारखंड में कांग्रेस झारखंड मुक्ति मोर्चा, आरजेडी और जेडी(यू) के साथ गठबंधन की तैयारी में है। यहां पर भी पार्टी का आकलन है कि बीजेपी बेहतर हालत में है।

चुनावी राज्यों में इन आंतरिक आकलनों ने ‘राहुल की रक्षा और सुरक्षा‘ वाली बात को हवा दे दी है। दरअसल, कांग्रेस की एक और चुनावी हार से गांधी की लीडरशिप स्टाइल को और खारिज किए जाने के तौर पर देखा जाने लगेगा। हालांकि, कुछ पुराने नेताओं का मानना है कि कथित राहुल समर्थक अपनी पोजिशन बचाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपना रहे हैं, क्योंकि गांधी का नेतृत्व और कमजोर पड़ने से इन नेताओं के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है।’


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