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विश्व राजनीति में नई साझेदारी की ओर भारत


नई दिल्ली,(एजेंसी) 22 सितम्बर । चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग के भारत दौरे के ऐन मौके पर लद्दाख के चुमर और देमचोक इलाके में घुसपैठ की घटनाएं नहीं होतीं तो शिखर वार्ता के नतीजों के आधार पर यही कहा जाता कि भारत और चीन के रिश्ते आसमान छू सकते हैं।

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18 सितंबर को शिखर बैठक के दौरान अतिक्रमण की घटनाओं के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सीमा मसला दोनों देशों के बीच रिश्तों में एक कांटे की तरह है। यह कांटा जितनी जल्दी निकाला जाएगा, भारत-चीन रिश्ते उतनी तेजी से बुलंदी पर राष्ट्रपति शी अपनी ओर से भारत दौरे में मुख्य जोर आर्थिक रिश्तों को गहरा करने और अपनी आर्थिक कूटनीति को आगे बढ़ाने पर देना चाहते थे।

जहां तक आर्थिक रिश्तों को गहरा करने की बात है तो मोदी ने इसमें चीन का खुल कर साथ दिया, लेकिन उसकी रेशम मार्ग जैसी आर्थिक कूटनीति से अपने को अलग कर लिया। चीन के दक्षिणी रेशम गलियारे (बांग्लादेश, चीन, भारत और म्यांमार आर्थिक गलियारा) से भी भारत ने केवल सहमति दिखाई, प्रतिबद्धता नहीं जताई।

व्यापार बढ़ाने पर जोर:-

अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुद चीन के राष्ट्रपति की अगवानी करने से मोदी और शी के बीच रिश्तों में एक तालमेल बना है जिसका लाभ उठाते हुए दोनों देश आने वाले सालों में आपसी रिश्तों को विवादरहित बनाने की ओर ले जा सकते हैं।

मोदी – शी वार्ता में दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को गहरा करने का जो संकल्प लिया गया है, उसका सकारात्मक असर राजनयिक रिश्तों पर भी पड़ेगा। क्योंकि इससे दोनों देशों की एक-दूसरे पर निर्भरता बढ़ जाएगी, दोनों देशों के लोगों और व्यापारियों के बीच मेलजोल गहरा होने लगेगा और दोनों मुल्कों के लोग एक-दूसरे को बेहतर समझने लगेंगे।

लेकिन केवल आर्थिक व्यवहार बढ़ाने से रिश्तों की कड़वाहट दूर हो ही जाए, यह जरूरी नहीं है। इसका उदाहरण चीन और जापान हैं जिनके बीच के व्यापारिक आंकड़े 307 अरब डॉलर को छू चुके हैं। बावजूद इसके, दोनों के बीच राजनयिक तनाव चरम पर है।

अस्सी के दशक में चीन के शिखर पुरुष तंग श्याओ फिंग कहते थे कि पहले आर्थिक रिश्ते सुधारो तो राजनीतिक रिश्ते खुद बेहतर होने लगेंगे। इसके जवाब में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और फिर राजीव गांधी का कहना होता था कि पहले सीमा मसले को हल करेंगे तभी एक – दूसरे पर भरोसा पैदा होगा और विश्वास के माहौल में ही दोनों देश आपसी राजनीतिक रिश्तों को गहरा कर सकेंगे। लेकिन ,पिछले दशक से भारत और चीन ने आर्थिक आदान – प्रदान बढ़ाने शुरू किए और आज यह 67 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। खास बात यह रही कि भारत और चीन ने आर्थिक रिश्ते गहरे करने के साथ – साथ सीमा मसले पर भी बातचीत जारी रखी और अब तक 30 से भी अधिक दौर की बातचीत हो चुकी है।

इसके बावजूद सीमा ( वास्तविक नियंत्रण रेखा ) पर दोनों की सेनाएं पहले की तरह आमने – सामने हैं। राहत की बात यही है कि भारत – पाकिस्तान सीमा की तरह भारत – चीन सीमा गंभीर मतभेदों के बावजूद खाली कारतूसों से अटी नहीं पड़ी है।
दोनों देशों के सैनिक बर्फीली पहाडि़यों पर भारी सर्दी झेलते हुए आमने-सामने हैं और एक – दूसरे पर चैकस नजर रखे हुए हैं कि कोई अतिक्रमण या घुसपैठ नहीं करे। इसके बावजूद अक्सर घुसपैठ की घटनाएं हो ही जाती हैं और एक – दो बार इसे लेकर रिश्तों में राजनयिक तनाव पैदा हो ही जाता है।

क्या है फॉर्मुला:-

इसी माहौल में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के विशेष प्रतिनिधियों की सीमा मसले पर 16 दौर की बातचीत पूरी हो चुकी है और इसमें सैद्धांतिक स्तर पर इसके हल का फॉर्म्युला भी निकाल लिया गया है। अब जरूरत इस बात की है कि 2005 के इस समझौते के अनुरूप दोनों देश ठोस बातचीत करें। 2005 के राजनीतिक दिशानिर्देश वाले समझौते में कहा गया है कि यदि दोनों पक्ष किसी खास इलाके को लेने की मांग करते हैं और वहां आबादी बसी है तो उसकी भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए।
इस नजरिए से भारत यह मान कर चल रहा है कि चीन जिस अरुणाचल प्रदेश और खासकर तवांग के इलाके की मांग कर रहा है , वहां रहने वाले लोग तो भारत के साथ हैं ही। इसलिए अरुणाचल और खासकर तवांग के इलाके पर भारत के जायज अधिकार को मान्यता देने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।

चीनी विदेश मंत्रालय के हाल के कुछ बयानों में 2005 के इस समझौते का जिस शैली में जिक्र किया गया है , उससे संकेत मिलता है कि यदि चीन से सही तरीके से बात की जाए तो अरुणाचल प्रदेश और तवांग इलाके पर चीन अपना अधिकार छोड़ सकता है। दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के जिस अक्साइ चिन इलाके पर ,जहां एक भी आदमी नहीं रहता, भारत अपना अधिकार त्याग कर सीमा समझौते पर पहुंच सकता है।

एक बार सीमा मसला हल हो जाए तो दोनों देशों के बीच और कोई बड़ा विवाद नहीं बचता। उस स्थिति में दोनों एशियाई देश साथ मिलकर विश्व राजनीति में नई पारी खेल सकते हैं।


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