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और अब ‘ मेक इन इंडिया‘


नई दिल्ली ,(एजेंसी) 26 सितम्बर । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बहुप्रचारित पहल ‘मेक इन इंडिया‘ गुरुवार को औपचारिक तौर पर लॉन्च कर दी गई। इस अवसर पर भारतीय उद्योग जगत के दिग्गजों की मौजूदगी से उनकी इस कार्यक्रम में दिलचस्पी का शुरुआती संकेत मिलता है।

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सरकार ने जिस तरह से विभिन्न देशों में स्थित अपने दूतावासों के जरिए दुनिया भर के निवेशकों तक इस योजना को पहुंचाने की कोशिश की है, उससे भी स्पष्ट होता है कि अपनी इस पहल को लेकर वह काफी गंभीर है।

सरकार ने 25 ऐसे क्षेत्र रेखांकित किए हैं, जिनमें भारत के वल्र्ड लीडर बनने की संभावना है। सरकार चाहती है कि दुनिया की सभी प्रमुख कंपनियां अपनी-अपनी रुचि के मुताबिक क्षेत्र चुनें, यहां आकर फैक्ट्री लगाएं और सामान बनाएं। भारत भले दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (पीपीपी के मुताबिक) बन गया हो, पर सच यह है कि सर्विस सेक्टर आधारित ग्रोथ मॉडल इसके पैरों की बेड़ी बना हुआ है।

इस महत्वाकांक्षी पहल के जरिए सरकार अर्थव्यवस्था को श्रम आधारित मैन्युफैक्चरिंग ड्रिवेन इकॉनमी का स्वरूप देना चाहती है। इस उद्देश्य में कोई खोट नहीं है। परेशानी सिर्फ यह है कि हम अभी तक अपनी प्राथमिकताओं को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुए हैं। जब हमारी कंपनी टाटा स्टील यूरोपीय कंपनी कोरस को खरीद लेती है, तब हम खुशी से फूले नहीं समाते। दूसरी तरफ जब साउथ कोरियन कंपनी पोस्को हमारे यहां से लौह अयस्क निकालकर अपने देश ले जाने वाला प्लांट लगाने की घोषणा करती है, तब उस पर भी गौरवान्वित होने का मौका हम नहीं चूकते।

एक सौदे में हमारी पूंजी बाहर जाती है, दूसरे में हमारा कच्चा माल बाहर जाता है, लेकिन हम दोनों पर ही गर्व कर रहे होते हैं। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए यह साफ करना जरूरी है कि मेक इन इंडिया से वह ठीक-ठीक क्या हासिल करना चाहती है।
दुनिया की तमाम कंपनियां सस्ते श्रम और सस्ती प्राकृतिक संपदा के मोह में यहां आ जाएं, यह एक बात है, लेकिन देसी-विदेशी कंपनियां यहां ऐसे सामान बनाएं जो दुनिया के दिलोदिमाग पर ‘मेड इन इंडिया‘ की छाप छोड़ जाएं, यह बिल्कुल अलग बात है।
इसरो ने अपनी उपलब्धियों के जरिए मेड इन इंडिया का सिक्का जमाने का एक रास्ता हमें दिखाया है। जरूरत इस बात की है कि सरकार अपनी प्राथमिकताएं साफ रखते हुए एक स्पष्ट रास्ता चुने और उस पर मजबूती से आगे बढ़े।


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