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जया की सजा से तमिल राजनीति में भूचाल


नई दिल्ली,(एजेंसी) 28 सितम्बर । एआईएडीएमके प्रमुख और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को डिस्प्रपोर्शनेट (इनकम डीए) मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में भूचाल सा आ गया है। अब जया को राजनीति से बाहर रहना पड़ेगा। ऐसे में अहम सवाल यह है कि जया के बगैर तमिलनाडु की राजनीति कैसी होगी।

Jaya In Jail

जयललिता का राजनीति करियर खत्म होने से तमिलनाडु की राजनीति में नए समीकरण बनने लगे हैं। निश्चित रूप से करुणानिधि की पार्टी डीएमके या विजय कांत की पार्टी डीएमडीके को फायदा मिलेगा। खबर है कि लोकसभा में बीजेपी से चुनाव लड़ने वाले विजय कांत ने डीएमके के साथ जाने का इशारा किया है।

चलेगा पर्दे के पीछे का खेल

तमिल राजनीति के विश्लेषक एस वेंकटेश का कहना है कि एआईएडीएमके का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि जया, पर्दे के पीछे कमान संभालने वाली कप्तान की भूमिका कैसे निभाती हैं। पार्टी में सेकंड लेयर लीडरशिप को लेकर तकरार शुरू हो चुकी है। कई सीनियर नेता, जो इस पद के लिए स्वयं को उपयुक्त मानते हैं, उन्होंने लॉबिंग शुरू कर दी है।

करुणानिधि को फायदा?

डीएमके प्रमुख करुणानिधि को इस स्थिति से राजनीतिक लाभ मिल सकता है। उन्होंने इस केस को तमिलनाडु से बाहर सुनवाई के लिए याचिका डाली थी। मगर जिस तरह से डीएमके का जनाधार खिसका है और डीएमके के नेताओं पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं…. करुणानिधि के वारिस को लेकर स्टालिन और अलयागिरी में द्वंद्व चल रहा है, उसने पार्टी को अवाम से दूर कर दिया।

ऐसे हुई जया की जय

गरीब लोगों और लड़कियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू कीं।
बुजुर्गों की पेंशन रकम बढ़ाई।
मिड डे मील के साथ 10वीं, 11वीं और 12वीं की लड़कियों को फ्री साइकिल दीं।
गरीबों को सस्ते में चावल, दाल दिया।

केरल में रेड अलर्ट

केरल सरकार ने केरल – तमिलनाडु सीमावर्ती क्षेत्रों में रेड अलर्ट जारी कर दिया है। राज्य के गृहमंत्री रमेश चेन्नितला ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि वह सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष सतर्कता बरतें।

इन पर भी गिर चुकी गाज

जया से पहले आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव , पूर्व टेलिकॉम मिनिस्टर सुखराम और हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चैटाला को कोर्ट दोषी करार दे चुकी है।
लालू प्रसाद यादव को सीबीआई कोर्ट ने करप्शन के मामले में 3 अक्टूबर , 2013 को 5 साल कैद की सजा सुनाई थी। यह मामला रांची हाई कोर्ट में पेंडिंग है।
पूर्व टेलिकॉम मिनिस्टर सुखराम को दिल्ली की निचली अदालत ने नवंबर 2011 में रिश्वतखोरी मामले में 5 साल कैद की सजा सुनाई थी।

हरियाणा के पूर्व सीएम ओम प्रकाश चैटाला को दिल्ली की निचली अदालत ने इसी साल 22 जनवरी को जेबीटी घोटाले में 10 साल कैद की सजा सुनाई थी। इस मामले में चैटाला व अन्य दोषियों के अपील पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने ऑर्डर रिजर्व कर रखा है। टूजी मामले में डीएमके नेता ए. राजा, कनिमोझी और पूर्व संचार मंत्री दया निधि मारन के खिलाफ अदालत में केस पेंडिंग है।

18 साल का उतार चढ़ाव

जयललिता इस मामले में प्रथम आरोपी थीं जबकि उनकी दोस्त शशिकला , उनके तत्कालीन दत्तक पुत्र वीएन सुधाकरन तथा शशिकला के एक रिश्तेदार जे इलावरासी मामले के अन्य आरोपी थे।
1996: डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ( तत्कालीन जनता पार्टी के नेता ) ने जयललिता के खिलाफ मामला दायर कर आरोप लगाया कि उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में 1991 से 1996 तक अपने कार्यकाल के दौरान आय के ज्ञात स्रोतों से इतर 66.65 करोड़ रुपये की संपत्ति बनाई।
7 दिसंबर 1996: जयललिता गिरफ्तार , आय से अधिक संपत्ति सहित कई आरोप लगे।
1997: जयललिता और तीन अन्य के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में चेन्नई की अतिरिक्त सत्र अदालत में अभियोग शुरू।
4 जून 1997: आईपीसी की धारा 120 बी , प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988 की धारा 13(2) एवं 13 (1)( ई ) के तहत आरोप पत्र दायर।
1 अक्तूबर 1997: मद्रास हाई कोर्ट ने जयललिता की ओर से दायर तीन याचिकाओं को खारिज किया। इनमें से एक याचिका में संपत्ति के मामले में राज्यपाल एम फातिमा बीवी द्वारा मुकदमे की अनुमति दिए जाने के निर्णय को चुनौती दी गई थी।
मई 2001: जयललिता मुख्यमंत्री बनीं। उनकी नियुक्ति को टीएएनएसआई ( तमिलनाडु लघु उद्योग निगम ) मामले में अक्तूबर 2000 में उनकी दोषसिद्धि के आधार पर चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने नियुक्ति को रद्द किया।
21 सितंबर 2001: जयललिता ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया। दोष सिद्धि खारिज होने के बाद जयललिता 21 फरवरी 2002 को अंदिपट्टी निर्वाचन क्षेत्र से उपचुनाव में निर्वाचित हुईं और पुनः मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। तीन लोक अभियोजकों ने इस्तीफा दिया।
2003: द्रमुक महासचिव के अनबझगन ने केस ट्रांसफर के लिए सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी।
18 नवंबर 2003: सुप्रीम कोर्ट ने केस बेंगलुरू ट्रांसफर किया।

पांचवे जज ने सुनाया फैसला

मुख्यमंत्री जयललिता को दोषी ठहराने वाले सपेशल जज जान माइकल डी कुन्हा के बारे में कहा जाता है कि वे गलत चीज बर्दाश्त नहीं करते और राजनीतिक रूप से इस संवेदनशील मामले में भी उन्होंने सख्त दृष्टिकोण का संकेत दिया है। इस ऐतिहासिक फैसले से लोगों का ध्यान आकर्षिक करने वाले डी कुन्हा इस 18 वर्ष पुराने मामले को देखने वाले पांचवे न्यायाधीश हैं।
स्पेशल कोर्ट के प्रथम न्यायाधीश एएस पछापुरे ने इस मामले को दिसंबर 2003 से देखना शुरू किया लेकिन अगस्त 2005 के बाद मामले की सुनवाई नहीं कर सके क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी ओर से जारी आदेश पर रोक लगाते हुए आय से अधिक सम्पत्ति के एक मामले में दो मामलों को जोड़ दिया। यह पद जुलाई 2007 में खाली हो गया जब पछापुरे को कर्नाटक हाई कोर्ट का जज बनाया गया।


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