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लालकृष्ण आडवाणी : अधूरे अरमान के आंसू


देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा कल बुधवार को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता एलके आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार सहित अन्य 13 नेताओं पर आपराधिक साजिश रचने के लिए भारतीय संविधान की धारा 120 बी के तहत मामला चलाए जाने की अनुमति दे दिए जाने के फैसले ने भारतीय सियासत पर बहुत असर डाल दिया है. सतही तौर से देखें तो यह मामला न्यायिक जगत की रोजमर्रा की प्रक्रिया का एक हिस्सा लगता है, लेकिन इसकी गहराई का आकलन करें तो पता लगेगा कि सर्वोच्च न्यायलय के इस फैसले ने भाजपा के वयोवृद्ध राजनेता लालकृष्ण आडवाणी के अंतिम अरमान राष्ट्रपति बनने पर भी पानी फेर दिया है. हालाँकि क़ानूनी रूप से आरोप लगाए जाने मात्र से उनकी राष्ट्रपति पद की दावेदारी में कोई अड़चन नहीं है, लेकिन नैतिकता का तकाजा उनकी राह का रोड़ा बन गया है. वैसे भी भाजपा को राष्ट्रवाद, अनुशासन और नैतिकता को लेकर ‘ पार्टी विथ डिफ़रेंस’ माना जाता है.

बाबरी मस्जिद मामले में कल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने विपक्षी दलों को बोलने का मौका दे दिया है. बकौल लालू यादव कोर्ट में सीबीआई वही बोलती है जो केंद्र सरकार चाहती है. यहां सुप्रीम कोर्ट के जज की टिप्पणी का उल्लेख प्रासंगिक है, जिसने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोते की संज्ञा दी थी. ऐसे में यह सवाल मौजूं है कि क्या केंद्र सरकार द्वारा आडवाणी को कोर्ट के जरिये एक बार फिर नेपथ्य में ले जाने के लिए किसी दूरदर्शी सोच को क्रियान्वित किया गया? यहां इस बात का आशय कोर्ट के फैसले पर ऊँगली उठाना नहीं है, लेकिन सियासत में किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि कल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में न केवल न्याय होता दिखा, बल्कि न्याय हुआ भी. इससे मुस्लिम वर्ग की यह धारणा भी दूर हुई की पीएम मोदी के रहते न्याय नहीं होगा.

सच पूछा जाए तो लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन का अंत तो तभी हो गया था जब वह पाकिस्तान में मोहम्मद जिन्ना की मजार पर माथा टेक आये थे. एक कट्टर हिंदूवादी नेता का यह कृत्य न तो देशवासियों को पसंद आया और न ही संघ को. इसके बाद उनके पराभव का जो सिलसिला चला वह नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद भी जारी है. गुजरात के सीएम मोदी का नाम पीएम पद के लिए प्रस्तावित करने से पहले विहिप, आरएसएस ने आडवाणी के जिन्ना मामले को विस्मृत नहीं किया, अन्यथा अटल जी के कार्यकाल में उप-प्रधान मंत्री बनने वाले आडवाणी की पीएम के लिए दावेदारी प्रबल थी. ऐसा नहीं है कि आडवाणी ने जिन्ना वाली अपनी सबसे बड़ी भूल के लिए माफ़ी नहीं मांगी, लेकिन कट्टरता के लिए विख्यात संघ ने इसे एक अक्षम्य अपराध माना जिसकी सजा वे अब तक भोग रहे हैं.

हालाँकि इतना सब कुछ होते हुए भी भाजपा उनकी एक त्रुटि के बदले उनके पार्टी के दिए योगदान को नहीं भूल सकती. किसी ज़माने में संसद में भाजपा के सांसदों की संख्या सिर्फ दो थी, तब से आडवाणी का संघर्ष जारी रहा. राम मंदिर के मुद्दे ने पार्टी को आज इस मुकाम पर पहुँचाया. इसमें उनके अध्यक्षीय काल के प्रखर राष्ट्रवाद के संकल्प की वजह से ही आज भाजपा संसद में 400 से ज्यादा सांसदों वाली पार्टी बन पाई है. यद्यपि इसमें कांग्रेस के प्रभावहीन नेतृत्व, मुस्लिम तुष्टिकरण, भ्रष्टाचार का भी अपरोक्ष योगदान रहा.

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के मुताबिक लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए जाने में कोई कानूनी बाधा नहीं है, क्योंकि अभी उन पर आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगा है जिसे इलाहाबाद की सीबीआई कोर्ट में ट्रायल होना है. यह कोर्ट तय करेगी कि यह आरोप आगे चलने योग्य है कि नहीं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा दैनिक सुनवाई कर दो साल में फैसला दिए जाने की समय सीमा तय किए जाने से भविष्य में होने वाली परेशानियों को दृष्टिगत रखते हुए अब आडवाणी की राष्ट्रपति पद की दावेदारी की संभावनाएं क्षीण हो गई है. चिंकी मुरली मनोहर जोशी भी पीएम की गुड बुक में शामिल नहीं है और वे भी इस मामले के सह आरोपी बनाए गए हैं तो वे भी इस दौड़ से बाहर हैं.

जहाँ तक राष्ट्रपति पद के लिए अन्य दावेदारों का सवाल है तो इस सूची में सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के नाम पर विचार करना इसलिए संभावित है, क्योंकि न केवल वे निर्विवाद हैं, बल्कि विपक्ष भी उनके लिए अपनी सहमति दे सकता है. महिला कार्ड भी खेला जा सकता है. जैसे कांग्रेस ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति बनाया था. वैसे भी पीएम मोदी महिलाओं के सशक्तिकरण पर ज्यादा जोर देते है. सुमित्रा महाजन के तार नागपुर से भी जुड़े है. इसलिए वहाँ से भी असहमति की सम्भावना नगण्य है. दूसरे दावेदार के रूप में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नाम पर भी विचार हो सकता है, जिसमे उनकी अस्वस्थता और विधि विशेषज्ञता मदद कर सकती है. स्वास्थ्यगत कारणों से पार्टी द्वारा उन्हें ससम्मान विदाई का यह मौका दिया जा सकता है. अन्य गुप्त नामों के बारे में इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि नमो को चौंकाने वाले फैसले लेने की आदत है.

अंत में, आडवाणी के बारे में बीजेपी छोड़कर गए गोविंदाचार्य की इस बात का उल्लेख समीचीन है कि लालकृष्ण आडवाणी अपनी पीएम बनने की उत्कट महत्वाकांक्षा के चलते राम मंदिर मुद्दे से जुड़े थे, लेकिन जिन्ना की मजार यात्रा ने उनकी राजनीतिक यात्रा पर विराम लगा दिया और वे पार्टी में भी वे अकेले पड़ गए. अब उनके लिए पश्चाताप के साथ अपने अधूरे अरमानों को लेकर आंसू बहाने के सिवा कुछ शेष नहीं रहा है.


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