Thursday , 23 September 2021
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सैन्य शिविर पर हमला


इस हफ्ते इस भरोसे पर तीखा प्रहार हुआ है कि नोटबंदी से आतंकवाद/उग्रवाद की कमर टूट गई। छत्तीसगढ़ में सुकमा के पास सीआरपीएफ के दस्ते पर घातक हमले के दो दिन बाद ही जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में एक सैन्य शिविर आतंकियों के निशाने पर आया। पंजगाम में गुरुवार तड़के सेना के कैंप पर उरी हमले की तर्ज पर धावा बोला गया। आधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों की गोलीबारी में एक कैप्टन समेत तीन सैन्यकर्मी शहीद हुए। पांच जवान घायल हुए। हालांकि मुठभेड़ में दो दहशतगर्द भी मारे गए, लेकिन सैन्य शिविर के निशाने पर आने से एक बार फिर देशवासियों की भावनाएं आहत हैं। आरंभिक संकेतों के मुताबिक हमला जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े दहशतगर्दों ने किया। इस गुट के अड्डे पाकिस्तान में हैं। पंजगाम नियंत्रण रेखा के करीब है। इसलिए आशंका है कि हमलावर सीमापार से आए होंगे।

रक्षा विशेषज्ञों में सहमति है कि पाकिस्तान फिदायीन हमलावरों को भारत में घुसपैठ कराने की रास्ते पर लगातार चल रहा है। बीते दो-तीन साल से उनकी रणनीति सेना के ठिकानों को निशाना बनाने की है। गुरदासपुर, पठानकोट, उरी और अब पंजगाम उस सिलसिले की कड़ी हैं। इन तमाम हमलों को सीमापार से संचालित किया गया। इसीलिए पिछले साल सितंबर में उरी हमले के बाद भारत ने बहुचर्चित सर्जिकल स्ट्राइक की थी। उसके बाद आठ नवंबर को जब नोटबंदी का एलान हुआ, तो उसका एक मकसद आतंकवादियों और नक्सलवादियों के फंडिंग के स्रोतों को खत्म करना भी बताया गया। लेकिन ताजा घटनाओं से साफ है कि उपरोक्त कदम नाकाफी साबित हुए। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद और छत्तीसगढ़ (तथा कुछ दूसरे राज्यों) में नक्सलवाद/माओवाद के हक में एक समान पहलू है। दोनों जगह आम आबादी के एक हिस्से का समर्थन हिंसक तत्वों को मिला हुआ है। इससे उग्रवादियों के खिलाफ कार्रवाई में दिक्कतें आती हैं। कश्मीर घाटी में देखा गया है कि आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के दौरान कुछ नौजवान सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी करने लगते हैं। छत्तीसगढ़ में भी कुछ आम लोग चरमपंथियों के छिपने और भागने में मददगार बनते हैं। आतंकवाद/नक्सलवाद से लड़ाई की दिशा तय करते समय इस पहलू पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए। आम आबादी का विश्वास जीतने और दहशतगर्दों को अलग-थलग कर उनके खिलाफ यथासंभव सख्त कार्रवाई करने की व्यापक तैयारी करनी होगी। कश्मीर में एक अहम पहलू दहशतगर्दी को सीमापार से मिलने वाला संरक्षण है। पाकिस्तान से कैसे निपटा जाए, यह पेचीदा सवाल है। लेकिन इसका जवाब भारत सरकार को ढूंढ़ना ही होगा। अपने जवानों को अपनी ही जमीन पर शहीद होते देखने का दुर्भाग्य यह देश लंबे समय से भुगत रहा है। देशवासियों का सब्र पहले ही चुक चुका है। इसलिए निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता है। आशा है, सरकार शीघ्र अपेक्षित कदम उठाएगी।

 


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