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‘आप’ के अफसाने से बेज़ार – बलबीर पुंज


जैसा कि अपेक्षित था, दिल्ली नगर निगम चुनाव में करारी हार के बाद आम आदमी पार्टी की अंदरूनी खींचतान खुलकर सबके सामने आ गई। इसके बाद इस पार्टी की और भी ज्यादा किरकिरी हो रही है। देखा जाए तो दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजे मुख्यत: दो महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित करते है। पहला – नकारात्मक, अवसरवादी और झूठ पर आधारित राजनीति अल्पायु होती है। दूसरा – देश को बांटने वाली विचारधारा और उनके समर्थकों से जनता घृणा कर रही है।

वर्ष 2015 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में ‘आप को अप्रत्याशित जनादेश मिला था, किंतु दो वर्ष के अंतराल में ऐसा क्या हुआ कि जो पार्टी 54.3 प्रतिशत मतों के साथ दिल्ली में पुन: सत्तारूढ़ हुई थी, उसे स्थानीय जनता ने 2017 के नगर निकाय चुनाव में 26.2 प्रतिशत मतों के साथ अस्वीकार कर दिया? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल 2011-12 के उस आंदोलन की उपज हैं जिसकी मूल कल्पना में राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, संविधान और तिरंगे को उच्च स्थान प्राप्त था। भारत माता की तस्वीरों से सुसज्जित आंदोलन स्थल ‘वंदेमातरम और ‘भारत माता की जय जैसे नारों से गुंजायमान रहता था। दिल्ली के जंतर-मंतर और बाद में रामलीला मैदान पर समाजसेवी अण्णा हजारे के नेतृत्व में चला यह आंदोलन, संप्रग शासनकाल में हुए 2जी, राष्ट्रमंडल खेल, कोयला घोटाले जैसे लाखों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के खिलाफ था। क्या आज इन सभी मूल्यों के प्रति केजरीवाल और उनकी पार्टी की कोई आस्था है?

फरवरी 2016 में दिल्ली स्थित जेएनयू में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जैसे नारे लगे। समूचा देश इससे आक्रोशित था। वहीं वामपंथियों और तथाकथित पंथनिरपेक्षियों की फौज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देशविरोधी नारे लगाने वालों के साथ खड़ी हो गई। इस श्रेणी में न केवल दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल अग्रणी रहे, बल्कि उन्हें इस मामले में देशद्रोह के एक आरोपी द्वारा दिया भाषण भी ‘जबर्दस्त लगा। गत वर्ष जब भारतीय सेना ने उरी में हुए आतंकी हमले का बदला लेते हुए पीओके में सर्जिकल स्ट्राइक की, तब भी केजरीवाल सहित अन्य स्वयंभू सेक्युलरिस्ट इस सैन्य कार्रवाई का प्रमाण मांगते नजर आए। पाकिस्तानी मीडिया ने केजरीवाल के वक्तव्य को आधार बनाकर भारत को घेरने का प्रयास भी किया। पंजाब विधानसभा चुनाव के समय भी आम आदमी पार्टी को विदेश में बसे खालिस्तानी समर्थकों का साथ मिला। यही वजह है कि देश की एकता-अखंडता के लिए खतरा मानते हुए पहले पंजाब की जनता ने केजरीवाल की राजनीति को नकारा तो अब दिल्लीवासियों ने भी अपनी पिछली गलती सुधारने का बीड़ा उठाया। पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव में पराजय और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव में करारी हार के लिए केजरीवाल व उनकी पार्टी मोदी सरकार पर ईवीएम से छेड़छाड़ कर चुनाव जीतने का अनर्गल आरोप लगा रही है। ये पार्टी देश की प्रमुख संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग से भी इस मसले पर टकराने को तैयार बैठी है।

दिल्ली नगर निगम चुनाव के नतीजे एक तरह से मीडिया संस्थानों द्वारा कराए गए सर्वेक्षणों का प्रतिबिंब ही थे। इसके बावजूद केजरीवाल ने राजनीतिक अपरिपक्वता और अहंकार का परिचय देते हुए कहा कि चुनाव नतीजे उनके पक्ष में नहीं आए तो वह ‘ईंट से ईंट बजा देंगे। इस प्रवृत्ति को भी जनता ने अस्वीकार कर दिया। 2013 में अवसरवादिता का परिचय देते हुए कांग्रेस की बैसाखी के सहारे 49 दिन सरकार चलाने और जिम्मेदारियों से भागने वाले केजरीवाल पर जनता ने 2015 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत देकर पुन: भरोसा किया, किंतु दो वर्ष के कार्यकाल में केजरीवाल और उनके मंत्रियों का अधिकांश समय विकास कार्य करने, अपने वादे पूरे करने और भ्रष्टाचार उन्मूलन की नीति बनाने के विपरीत केवल दिल्ली से बाहर रहने और दूसरों (खासकर प्रधानमंत्री मोदी व दिल्ली के उप-राज्यपाल) की आलोचना करने पर अधिक व्यतीत हुआ।

दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है। 1992 में राज्य की मान्यता मिलने के बावजूद अन्य राज्यों की तुलना में दिल्ली के पास सीमित अधिकार हैं। दिल्ली विधानसभा को सेवा, जन-व्यवस्था, पुलिस व जमीन के मामले में कानून बनाने का अधिकार नहीं है। संविधान ने यह अधिकार संसद को सौंपा है। क्या दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्रियों (मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा, सुषमा स्वराज और शीला दीक्षित) ने सीमित संवैधानिक दायित्वों का सम्मान नहीं किया?

आम आदमी पार्टी ने जनता से सादगी व आदर्शवादी राजनीति का झूठा वादा करके पहले गाड़ी और बंगले लिए। फिर संवैधानिक प्रक्रियाओं और नियमों को ताक पर रखकर 21 विधायकों को लाभ का पद दिया। पार्टी के कार्यक्रम में जनता के पैसों से 16 हजार रुपए की शाही थाली परोसने का आरोप लगा। यही नहीं, आज ‘आप के कई विधायक किसी न किसी आपराधिक मामले में आरोपित हैं। कुछ को गिरफ्तार भी किया जा चुका है।

ईमानदारी का चोला ओढ़े ‘आप की सच्चाई धीरे-धीरे जनता के समक्ष आ रही है। दिल्ली में दो वर्ष के कार्यकाल में एंबुलेंस घोटाला, ऑटो परमिट घोटाला, टैंकर घोटाला, प्रीमियम बस सर्विस घोटाला और वीआईपी नंबर प्लेट घोटाला सामने आया है। दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग द्वारा नियुक्त एक समिति ने ‘आप सरकार पर नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। इसमें स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की बेटी की मोहल्ला क्लीनिक परियोजना में और केजरीवाल की पत्नी के रिश्तेदार निकुंज अग्रवाल के स्वास्थ्य मंत्री के ओएसडी के रूप में नियुक्ति भी शामिल है।

केजरीवाल की अधिनायकवादी मानसिकता ने दिल्ली के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में केवल अराजकता ही फैलाई है। एक जिम्मेदार संवैधानिक पद पर होते हुए भी संविधान के विभिन्न् स्तंभों से निरंतर टकराने की उनकी प्रवृत्ति हो गई है। ‘आप की सरकार बिजली-पानी के मोर्चे को छोड़कर अपने घोषणापत्र में किए वादों को पूरा करने की दिशा में विफल सिद्ध हुई है। लोकलुभावन वादों का आर्थिक बोझ दिल्ली सरकार कैसे वहन करेगी? ‘आप सरकार के पास इसकी कोई ठोस योजना ही नहीं है। विचारधाराविहीन ‘आप के गठन से लेकर आज तक केजरीवाल ने अपनी सियासी महत्वाकांक्षाओं व हितों को ही साधने का प्रयास किया है। ‘आप को अपार जनसमर्थन तो मिला, किंतु अराजक कार्यशैली और नकारात्मक एवं झूठ की राजनीति के कारण वह अल्पकाल में ही इतिहास के पन्न्ों में सिमटने को तैयार है। 2014 से लेकर 2017 के बीच जितने भी चुनाव हुए उनमें अधिकतर आए परिणामों से एक स्पष्ट संदेश प्राप्त हुआ है। जनता सेक्युलरवाद के नाम पर अराजक शक्तियों का साथ और अराजक शैली को बर्दाश्त नहीं करेगी।

 


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