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AIDS दिवस: दवाओं की कमी की वजह से मुसीबत में मरीज


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नई दिल्ली,(एजेंसी) 01 दिसंबर । 34 वर्षीय एड्स पीड़ित रतन सिंह जीना चाहता था। उसने एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) ड्रग्स की अपनी दूसरी लाइन थेरेपी के लिए खूब बचत की। यहां तक कि अपने परिवार एवं दोस्तों से बहुत बड़ी रकम उधार ली। रतन मणिपुर स्थित अपने स्थानीय सरकारी केंद्र पर दवाइयां उपलब्ध न होने के कारण उन्हें खुले बाजार से खरीदने के लिए मजबूर हो गया था। महंगी दवाइयां खरीदने में असमर्थ रतन ने जल्द ही इस बीमारी से लड़ते-लड़ते दम तोड़ दिया।

वहीं, दिल्ली निवासी राहुल ने वर्ष 2006 में एचआईवी का पता चलने पर आर्ट दवाइयों का इस्तेमाल शुरू किया। उसके बाद से ही उसे कभी सही परामर्श और सहयोग नहीं मिला। परिणामस्वरूप उसने आर्ट केंद्र जाना छोड़ दिया। उसकी सेहत गिर गई और अब वह सेकेंड लाइन आर्ट पर है। वजह एकदम साफ है। उसे आर्ट के टोटे की वजह से पूरी खुराक नहीं दी गई।

कुछ ऐसी ही कहानी छोटी सी कीर्तिगा की भी है। तिर्ची निवासी पांच वर्षीया कीर्तिगा जन्म से एचआईवी पॉजीटिव है और उसे नियमित रूप से आर्ट उपचार की जरूरत है। लेकिन तिर्ची केंद्र पर आर्ट दवाएं उपलब्ध न होने की वजह से कीर्तिगा की मजदूर मां उसे हर माह चेन्नई आर्ट केंद्र ले जाने को मजबूर है।

ये तीनों मामले यूं तो एक दूसरे से अलग हैं, लेकिन इससे देश में आर्ट ड्रग्स के कमी की तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है। विशेषज्ञों और गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) के अनुसार, स्थिति बद से बदतर हो गई है। हालांकि, इस बारे में कोई पुख्ता आंकड़े नहीं हैं कि आर्ट ड्रग्स की कमी की वजह से एचआईवी/एड्स से कितने लोगों की जान जा रही है, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, देश में वर्ष 2012 में एड्स के चलते 1,40,000 लोगों की जान गई। स्वास्थ्य मंत्रालय ने फरवरी में कहा था कि सर्विलांस डाटा के मुताबिक, देश में 29 लाख लोग एचआईवी (पीएलएचआईवी) के साथ जी रहे हैं। करीब 7,47,175 पीएलएचआईवी को नि:शुल्क पहली लाइन एंटी-रेट्रोवायरल ट्रीटमेंट मिल रहा है और 7,224 पीएलएचआईवी को नि:शुल्क दूसरी लाइन ड्रग्स मिल रही है।

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर जान बचाने वाली ये दवाएं कहां हैं? राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया, ‘इस मामलों में उच्च स्तर पर सरकार और अधिकारियों पर दोष मढ़ना आसान है।’

उन्होंने कहा, ‘वर्ष 2010 तक आर्ट दवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में विदेशी एजेंसियों, दवा फर्मो और संयुक्त राष्ट्र की सहभागिता 70 फीसद थी, जबकि भारत सरकार की भूमिका मात्र 30 फीसद थी। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद द्वारा पूरा परिदृश्य बदलने को लिए गए फैसले ने खरीद प्रक्रिया को शिथिल कर दिया।’

अधिकारी ने कहा, ‘अब विदेशी एजेंसियों से मदद सिर्फ जरूरत पड़ने पर ली जाती है। आर्ट दवाओं की खरीद के लिए टेंडर पहले ही भारतीय दवा कंपनियों को दे दिए गए हैं। वर्ष 2015 तक सब कुछ ठीक हो जाएगा और दवाओं की कमी नहीं होगी।’ वहीं भारतीय संगठन नेटवर्क फॉर पीपुल्स लिविंग विद एचआईवी एंड एड्स का कहना है कि एचआईवी मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है।


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