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सत्यार्थी और मलाला को शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया


नई दिल्ली,(एजेंसी)11 दिसंबर । भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को दुनिया के सबसे बड़े सम्मान यानी नोबेल पुरस्कार से उन्हें नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में नवाजा गया।

Malala & Satyarthi

भारतीय उप महाद्वीप में बाल अधिकारों को बढ़ावा देने को लेकर काम करने के लिए भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को आज संयुक्त रूप से शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।

नार्वे की नोबेल समिति के प्रमुख थोर्बजोर्न जगलांद ने पुरस्कार प्रदान करने से पहले अपने संबोधन में कहा, ‘‘सत्यार्थी और मलाला निश्चित तौर पर वही लोग हैं जिन्हें अलफ्रेड नोबेल ने अपनी वसीयत में शांति का मसीहा कहा था।’’ उन्होंने कहा, ‘‘एक लड़की और एक बुजुर्ग व्यक्ति, एक पाकिस्तानी और दूसरा भारतीय, एक मुस्लिम और दूसरा हिंदू, दोनों उस गहरी एकजुटता के प्रतीक हैं जिसकी दुनिया को जरूरत है।

कौन हैं नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी?

देशों के बीच भाईचारा…’’ सत्यार्थी (60) ने इक्लेट्रिकल इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर बाल अधिकार के क्षेत्र में काम करना आरंभ किया और वह ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ नामक गैर सरकारी संगठन का संचालन करते हैं।

दूसरी ओर तालिबान के हमले में बची 17 साल की मलाला लड़कियों की शिक्षा की पैरोकारी करती हैं। शांति के नोबेल के लिए दोनों के नामों का चयन नोबेल शांति पुरस्कार समिति ने बीते 10 अक्तूबर को किया था। सत्यार्थी और मलाला को नोबेल का पदक मिला जो 18 कैरेट ग्रीन गोल्ड का बना है और उस पर 24 कैरेट सोने का पानी चढा हुआ है तथा इसका कुल वजन करीब 175 ग्राम है।

हिंसा और दमन को किसी भी धर्म में उचित नहीं ठहराए जाने का जिक्र करते हुए जगलांद ने कहा कि इस्लाम, ईसाई, जैन, हिंदू और बौद्ध जीवन की रक्षा करते हैं और जीवन लेने के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकते।

संस्मरण: जब मैंने कैलाश जी से यह पूछा तो उन्होंने दिया दिलचस्प जवाब

उन्होंने कहा, ‘‘जिन दो लोगों को हम आज यहां सम्मानित करने के लिए खड़े हैं वे इस बिंदु पर बहुत खरे हैं। वे उस सिद्धांत के मुताबिक रहते हैं जिसकी अभिव्यक्ति गांधी ने की थी। उन्होंने कहा था कई ऐसे उद्देश्य हैं जिनके लिए मैं अपने प्राण दे दूं। ऐसा कोई उद्देश्य नहीं हैं जिसके लिए मैं हत्या करूं।’ ’’

सत्याथी के गैर सरकारी संगठन बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) ने भारत में कारखानों और दूसरे कामकाजी स्थलों से 80,000 से अधिक बच्चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराया।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के मुताबिक दुनिया भर में 16.8 करोड़ बाल श्रमिक हैं। माना जाता है कि भारत में बाल श्रमिकों का आंकड़ा 6 करोड़ के आसपास है।

सम्मान समारोह में मोदी और शरीफ को साथ बुलाना चाहती हैं नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई

Satyarthi & Malala

मलाला को पिछले साल भी शांति के नोबेल के लिए नामांकित किया गया था। उन्होंने तालिबान के हमले के बावजूद पाकिस्तान सरीखे देश में बाल अधिकारों और लड़कियों की शिक्षा के लिए अपने अभियान को जारी रखने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए अदम्य साहस का परिचय दिया।

पुरस्कार ग्रहण करने के बाद सत्यार्थी ने वहां उपस्थित दर्शकों से कहा कि वे अपने भीतर बच्चे को महसूस करें और उन्होंने यह भी कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराध के लिए समाज में कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘बच्चे हमारी अकर्मणयता को लेकर सवाल कर रहे हैं और हमारे कदम को देख रहे हैं।’’ इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सभी धर्म बच्चों की देखभाल करने की शिक्षा देते हैं।

बाल श्रमिकों की संख्या में कमी का जिक्र करते हुए सत्यार्थी ने कहा, ‘‘मेरा सपना है कि हर बच्चे को विकास करने के लिए मुक्त किया जाए..बच्चों के सपनों को पूरा नहीं होने देना से बड़ी हिंसा कुछ नहीं है।’’

नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पांचवें भारतीय नागरिक हैं सत्यार्थी

समाज के कमजोर तबकों के लोगों के साथ के अपने अनुभव को साझा करते हुए नोबेल पुरस्कार विजेता ने कहा, ‘‘मैं उन करोड़ों बच्चों का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं जिनकी आवाजें दबी हुई हैं और वे कहीं गुमनामी में जी रहे हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इस सम्मान का श्रेय उन लोगों को जाता है जिन्होंने बच्चों को मुक्त कराने के लिए काम किया और त्याग दिया।’’ नोबेल पुरस्कार समारोह में पाकिस्तान के मशहूर गायक राहत फतेह अली खान और भारतीय संगीत जगत के चर्चित के नाम अमजद अली खान ने जलवा बिखेरा। यहां पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी भी मौजूद थे।

कौन हैं कैलाश सत्यार्थी और मलाला?

बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है. वे 1980 से ही बाल मजदूरी के खिलाफ अभियान चला रहे हैं। सत्यार्थी के संगठन बचपन बचाओ आंदोलन ने देश के अलग अलग हिस्सों से अब तक 80 हज़ार बच्चों को बाल मजदूरी से छुड़वाया है और उन्हें पुनर्वास भी करवाया है।

सत्यार्थी ने बाल मजदूरी को मानवाधिकार के साथ-साथ बच्चों के कल्याण के तौर पर उठाया। उनका तर्क था कि गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, जनसंख्या वृद्धि और दूसरे सामाजिक मुद्दों की के बारे में समाज को पता होना चाहिए और उससे निजात दिलाने के लिए कार्य करने चाहिए।

वहीं 17 वर्षीय मलाला तब सुखिर्यों में आयीं जब तालिबान आतंकवादियों ने लड़कियों की शिक्षा की वकालत करने को लेकर उन्हें गोली मार दी थी। नोबेल शांति पुरस्कार समिति ने दोनों को इस वर्ष इस शीर्ष वैश्विक पुरस्कार के लिए चुना।

Malala Yusuf Jai

मलाला को शांति पुरस्कार श्रेणी में गत वर्ष भी नामांकित किया गया था। मलाला ने तालिबान के हमले के बाद भी तब जबर्दस्त साहस दिखाया था जब उन्होंने विशेष तौर पर पाकिस्तान जैसे देश में बाल अधिकारों और लड़कियों की शिक्षा के लिए अपना अभियान जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी।

गोली लगने के बाद घायल मलाला को बेहतर इलाज के लिए बर्मिंघम स्थित क्वीन एजिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया था। वहां उनके उन घावों का इलाज किया गया था जो उनकी जान को खतरा उत्पन्न कर रहे थे। वह लड़कियों की शिक्षा का अपना अभियान जारी रखे हुए हैं।

मलाला सबसे कम आयु की नोबेल पुरस्कार विजेता बन गई हैं सत्यार्थी मदर टेरेसा के बाद शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले दूसरे भारतीय बन गए हैं। सत्यार्थी और मलाला प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय उन हस्तियों की विशिष्ट सूची में शामिल हो गए हैं जिन्होंने विश्व शांति और अन्य क्षेत्रों में अपने उल्लेखनीय कार्य के लिए शांति का नोबेल पुरस्कार साझा किया।

नार्वे क्यों देता है नोबेल शांति पुरस्कार ?

स्टॉकहोम: क्या आपने कभी सोचा है कि नार्वे की एक कमेटी नोबेल शांति पुरस्कार ओस्लो में ही क्यों देती है जबकि दूसरे नोबेल पुरस्कार स्वीडन की राजधानी में दिए जाते हैं ? सन् 1901 में जब से नोबेल पुरस्कार प्रदान किया जाने लगा , उसी समय से इसके संस्थापक अल्फ्रेड नोबेल की इच्छा के मुताबिक नार्वे की संसद स्टॉर्टिंग द्वारा नियुक्त पांच लोगों की कमेटी शांति पुरस्कार देती है।

Noabal Prize Winner

अल्फ्रेड नोबेल ने कभी इस रहस्य से पर्दा नहीं हटाया कि शांति पुरस्कार प्रदान करने का जिम्मा उन्होंने स्वीडिश संस्था को क्यों नहीं सौंपा।

बहरहाल, इस बारे में कयास ही लगाए जाते रहे हैं। एक दलील है कि नोबेल ने नार्वे के देशभक्त और अग्रणी लेखक बोर्न्‍सत्जेर्ने बोर्नसन की हिमायत की थी। यह भी कहा जाता है कि अंतरराष्ट्रीय शांति आंदोलन के समर्थन में वोट करने वाली किसी भी देश की पहली संसद स्टॉर्टिंग ही थी।

हो सकता है कि नोबेल ने स्वीडन-नार्वे यूनियन के भीतर नोबेल पुरस्कार संबंधी काम के बंटवारे का भी पक्ष लिया हो। यह भी कि, उन्हें यह डर रहा होगा कि शांति पुरस्कार की बेहद उच्च राजनीतिक प्रकृति को देखते हुए यह कहीं सत्ता राजनीति का एक औजार न बन जाए और शांति के हथियार के तौर पर इसकी महत्ता कम ना हो जाए।

नोबेल ने अपने वसीयत में लिखा ‘‘यह मेरी इच्छा है कि पुरस्कार देते वक्त उम्मीदवारों की राष्ट्रीयता नहीं देखी जाए। सुयोग्य उम्मीदवार को यह मिले ,चाहे वह स्कैंडिनेवियाई हो या नहीं।’’ 20 वीं सदी में स्कैंडिनेवियाई क्षेत्र के आठ लोगों ने पुरस्कार जीता। इसमें स्वीडन के पांच, नार्वे के दो और डेनमार्क का एक पुरस्कार शामिल है।

नामांकन और चयन प्रक्रिया में कमेटी को हमेशा एक सचिव का सहयोग मिला और 1904 में नार्वे नोबेल संस्थान की स्थापना के बाद से यही व्यक्ति संस्थान का निदेशक भी रहा। 1901 से नार्वे नोबेल कमेटी के फैसले के खिलाफ कई प्रदर्शन भी हुए और उसे कड़ी आलोचना का शिकार भी होना पड़ा।

10 दिसंबर को आयोजित किया जाने वाला शांति पुरस्कार समारोह एक लंबी चयन प्रक्रिया का समापन कार्यक्रम होगा। नियमों के मुताबिक, हर साल एक श्रेणी में अधिकतम तीन पुरस्कार विजेता हो सकते हैं।

नार्वे की नोबेल कमेटी पूरी प्रक्रिया की शुरूआत नामांकन आमंत्रित करने से करती है और हर साल एक फरवरी तक आवेदन लिया जाता है।

नोबेल शांति पुरस्कार के वास्ते उम्मीदवारों का नामांकन कौन कर सकता है? नोबेल कमेटी के मौजूदा और पूर्व सदस्य तथा नोबेल संस्थान में सलाहकार, राष्ट्रीय असेंबली और सरकार के सदस्य, अंतर संसदीय यूनियन के सदस्य, स्थायी मध्यस्थता न्यायाधिकरण के सदस्य और दि हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और स्थायी अंतरराष्ट्रीय शांति ब्यूरो आयोग के सदस्य।

इसके अलावा इंस्टीट्यूट डे ड्रोइट इंटरनेशनल और विश्वविद्यालय के कानून, राजनीति विज्ञान, इतिहास और दर्शन के प्रोफेसर और नोबेल शांति पुरस्कार धारक भी नामांकन कर सकते हैं। योग्यता की समीक्षा के बाद उम्मीदवारों की एक अंतिम सूची बनायी जाती है।

पुरस्कार विजेताओं ने नामों की घोषणा आमतौर पर मध्य अक्तूबर में नोबेल इंस्टीट्यूट बिल्डिंग में शुक्रवार के दिन की जाती है और हर साल यह पुरस्कार दस दिसंबर को दिया जाता है। सन् 1896 की दस दिसंबर को ही अल्फ्रेड नोबेल का निधन हुआ था।


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