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सुरक्षा एजेंसियों की ‘लापरवाही’ और ‘तालमेल की कमी’ बनी 26/11 हमले की वजह: रिपोर्ट


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न्यूयॉर्क/ नई दिल्ली,(एजेंसी) 22 दिसंबर । मुंबई हमले ‘खुफियागीरी के इतिहास में सबसे गंभीर चूकों में से एक’ के परिणाम के चलते हुए जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन और भारतीय गुप्तचर एजेंसियां भारत की वित्तीय राजधानी पर हमले को टालने के लिए अपने हाईटेक निगरानी तंत्र द्वारा जुटाई गयी जानकारी को एक साथ रखने में नाकाम रहीं ।
न्यूयॉर्क टाइम्स, प्रोपब्लिका और पीबीएस सीरीज ‘फ्रंटलाइन’ की ‘इन 2008 मुंबई किलिंग्स, पाइल्स ऑफ स्पाई डाटा, बट एन अनकंप्लीटेड पजल’ शीषर्क वाली एक विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है, ‘मुंबई हमलों का छिपा इतिहास संवेदनशीलता, कंप्यूटर निगरानी की शक्ति और इंटरसेप्ट्स के आतंकवाद रोधी हथियार के रूप में होने का खुलासा करता है।’ इस विस्तृत रिपोर्ट में कहा गया है, ‘आगे जो हुआ, वह खुफियागीरी के इतिहास में सर्वाधिक घातक चूकों में से एक है । तीन देशों की खुफिया एजेंसियां अपने हाईटेक निगरानी और अन्य उपकरणों द्वारा जुटाई गइ सभी जानकारी को एकसाथ रखने में नाकाम रहीं, जिनसे आतंकी हमले को रोका जा सकता था, जो इतना भयावह था कि इसे अक्सर भारत का 9/11 कहा जाता है।’

नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के पूर्व कांट्रैक्टर एडवर्ड स्नोडेन द्वारा लीक किए गए गोपनीय दस्तावेजों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया कि यद्यपि इलेक्ट्रानिक रूप से बातों पर निगरानी रखने से अक्सर मूल्यवान डाटा मिलता है, लेकिन यदि प्रौद्योगिकी पर करीब से नजर न रखी जाए, इससे निकली खुफिया सूचना को अन्य सूचना से न मिलाया जाए, या डिजिटल डाटा के भंडार से निकल रही गतिविधि का सही विश्लेषण न किया जाए तो संकेतों से चूक सकती हैं । रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वाधिक खुफिया विफलता के उदाहरणों में से एक में भारतीय और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने 26/11 की योजना बनाने वाले और पाकिस्तान आधारित लश्कर ए तैयबा आतंकी समूह के प्रौद्योगिकी प्रमुख जरार शाह की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखी थी, लेकिन वे हमलों से पहले ‘कड़ियों को नहीं जोड़ पाईं।’ मुंबई हमलों में छह अमेरिकियों सहित 166 लोग मारे गए थे ।
वर्ष 2008 में शाह ‘भारत के वाणिज्यिक शहर मुंबई पर हमले की योजना बनाते हुए पाकिस्तान के उत्तर में स्थित पर्वतीय क्षेत्र स्थित चौकियों से अरब सागर के नजदीक सुरक्षित घरों तक घूमा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि सितंबर तक वह इस बात से अनजान था कि ब्रिटिश एजेंसियां उसकी बहुत सी ऑनलाइन गतिविधियों की जासूसी कर रही हैं और उसके इंटरनेट सर्चेज तथा संदेशों पर नजर रख रही हैं। इसमें अभियान पर जानकारी देने वाले एक पूर्व अधिकारी के हवाले से कहा गया है, ‘सिर्फ ब्रिटेन की खुफिया एजेंसियां ही उस पर निागह नहीं रख रही थीं । शाह पर इसी तरह की नजर एक भारतीय खुफिया एजेंसी भी रख रही थी।’

रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि अमेरिका दोनों देशों की एजेंसियों के प्रयासों से अनभिज्ञ था, लेकिन इसने अन्य इलेक्ट्रानिक तथा मानव स्रोतों से साजिश के कुछ संकेत पकड़े थे, और भारतीय सुरक्षा अधिकारियों को हमले से महीनों पहले कई बार आगाह किया था। इसमें हमलों से महीनों पहले अमेरिका, भारत और ब्रिटेन की एजेंसियों द्वारा जुटाई गई खुफिया सूचना के संदर्भ में पूर्व सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन के हवाले से कहा गया है कि ‘किसी ने भी समूची तस्वीर को साफ नहीं किया।’ हमलों के समय तत्कालीन विदेश सचिव रहे मेनन ने कहा, ‘न अमेरिकियों ने, न ब्रिटिशों ने और न भारतीयों ने जब गोलीबारी शुरू हो गई तो हर किसी ने सूचना साझा करनी शुरू कर दी।’ ब्रिटिश एजेंसियों ने शाह के संचार से डाटा के एक भंडार तक पहुंच बना ली थी, लेकिन कहा कि सूचना खतरे का पता लगाने के लिए पर्याप्त रूप से विशिष्ट नहीं थी। रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिका से अलर्ट के बावजूद भारत साजिश का पता नहीं लगा पाया ।

अमेरिकी जिन महत्वपूर्ण संकेतों से चूक गए उनमें एक पाकिस्तानी-अमेरिकी डेविड हेडली की गतिविधियों से संबंधित था जिसने मुंबई हमलों के लिए लक्ष्य तलाशे थे और वह साजिशकर्ताओं के साथ ईमेल्स के जरिए संपर्क में था । लेकिन अमेरिका 2009 के अंत में शिकागो में उसकी गिरफ्तारी तक उसकी गतिविधियों से अनजान रहा । रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की आतंकवाद रोधी एजेंसियां भी हेडली की असंतुष्ट पत्नी से मिली जानकारी पर काम करने में विफल रहीं । हेडली की पत्नी ने मुंबई हमलों से काफी पहले अमेरिकी अधिकारियों को बताया था कि उसका पति एक पाकिस्तानी आतंकवादी है और वह मुंबई में रहस्यमय मिशन चला रहा है ।
वर्ष 2008 के शुरू में आतंकवाद रोधी भारतीय और पश्चिमी एजेंसियों ने मुंबई पर संभावित हमले के बारे में बातचीत को पकड़ना शुरू किया था । भारतीय एजेंसियों और पुलिस ने मुंबई को लश्कर ए तैयबा से खतरे के बारे में समय-समय पर अपने स्रोतों से खुफिया जानकारी हासिल की थी । रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी और भारतीय अधिकारियों के अनुसार सितंबर के अंत में और फिर अक्तूबर में लश्कर ए तैयबा ने समुद्र के रास्ते हमलावरों को मुंबई भेजने के प्रयास किए । उस समय सीआईए की ओर से कम से कम दो चेतावनी मिलीं।

इसमें कहा गया कि सितंबर के मध्य में मिले एक अलर्ट में कहा गया था कि ताज होटल हमले के आधा दर्जन संभावित लक्ष्यों में शामिल है । उस समय होटल की सुरक्षा अस्थाई रूप से बढ़ा दी गई थी । इसके अलावा 18 नवंबर को मिले एक अन्य अलर्ट में लश्कर ए तैयबा के हमले से संबंधित एक पाकिस्तानी पोत की जगह के बारे में जानकारी दी गई थी । चौबीस नवंबर तक शाह कराची पहुंच चुका था जहां उसने अबू जंदाल नाम के एक भारतीय आतंकवादी की मदद से इलेक्ट्रानिक कंट्रोल रूम स्थापित किया । यह जानकारी जंदाल ने भारतीय अधिकारियों को पूछताछ में दी थी ।

हमला शुरू होने पर इसी कंट्रोल रूम से मीर, शाह और अन्य ने हमलावर टीम को मिनट दर मिनट दिशा निर्देश दिए जाने थे । रिपोर्ट में कहा गया कि मुंबई में लश्कर के 10 आतंकवादियों द्वारा प्रमुख जगहों पर हमला शुरू किए जाने के तुरंत बाद तीनों देशों ने खुफिया जानकारी एक-दूसरे के साथ साझा करनी शुरू कर दी और पाकिस्तान में लश्कर के कंट्रोल रूम की भी निगरानी शुरू कर दी जहां से आतंकी आका अपने लोगों को निर्देश दे रहे थे । एनएसए के एक अत्यंत गोपनीय दस्तावेज में कहा गया कि खुफिया एजेंसियों के बीच सहयोग से हमलों की संपूर्ण साजिश से जुड़ी कड़ियों का विश्लेषण करने में मदद मिली ।


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