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लोकतंत्र में आरोप नहीं बल्कि आलोचना बेहद जरुरी: मोदी


नई दिल्ली,(एजेंसी),3 जनवरी । महाराष्ट्र के कोल्हापुर में एक मराठी अखबार के 25वीं सालगिरह के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की मीडिया और उसके द्वारा की जाने वाली आलोचना को बेहद जरुरी बताते हुए कहा, “लोकतंत्र में अगर आलोचना नहीं होगी तो रुकावट आ जाएगी ठहराव आ जाएगा, बहते पानी में कभी गंदगी नहीं होती लेकिन जब एक बार पानी ठहर जाता है तो गंदगी होना भी शुरू हो जाती है और इसलिए लोकतंत्र का शुद्धिकरण व्यवस्थाओं का शुद्धिकरण इसका उत्तम कोई इलाज है तो आलोचना है। हर निर्णय की आलोचना होनी चाहिए, हर विषय की आलोचना होनी चाहिए, तराजू पर तराशना चाहिए, संवाद हो, विवाद हो और फिर सोने की तरह तपकर निकला वह विचार शाश्वत बन जाता है, वो पीढ़ियों तक काम आता है।

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प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि, “अगर सबलोग हमारा क्या लेना-देना है.. करने दो जो करते हैं,.. हमारा तो अखबार चलता है, हमारा क्या है तो वाला नजरिया अपनाएंगे तो फिर लोकतंत्र का बहुत भारी नुकसान हो जाता है और इसलिए इस बात का मैं पक्षधर हूं कि लोकतंत्र में आलोचना का महिमामंडन होना चाहिए. आलोचना से दुखी नहीं होना चाहिए. आलोचना से सत्य को अच्छी तरह परखने का अवसर मिलता है। आलोचना से गलत राह पर भटकने से बचने की संभावना पैदा होती है। आलोचना से नई गलतियां करने से रोका जा सकता है और इसलिए मीडिया के माध्यम से ये सेवा सर्वोत्तम हो सकती है लेकिन मुझे दुख के साथ कहना है कि आज आलोचना नहीं होती है और आलोचना न होने के कारण सबसे ज्यादा बर्बाद कोई हो रहा है तो सत्ता में बैठे हुए लोग बर्बाद हो रहे हैं।”

मोदी ने आगे कहा कि, “2015 में हम आज संकल्प करें कि हम आलोचना करने के अधिकार को और अधिक पैना करेंगे, और अधिक तेज करेंगे लेकिन आलोचना नहीं होती है तो ये लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है आलोचना नहीं होती लेकिन आरोप होते हैं, आरोप से कुछ नहीं निकलता.. तू-तू, मैं-मैं होती है.. तीन दिन गाड़ी चलती है और फिर चौथे दिन नई चीज आ जाती है… आरोप करने के लिए मेहनत नहीं लगती, आलोचना करने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, एक विषय का गहराई से अध्ययन करना पड़ता है। पक्ष-विपक्ष को देखना पड़ता है, उसकी बारीकियों को निकालना पड़ता है और तब जाकर आलोचना संभव होती है लेकिन आज जिंदगी में इतनी दौड़ है, स्पर्धाएं इतनी तेज है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से स्पर्धा, प्रिंट मीडिया से स्पर्धा, सोशल मीडिया से स्पर्धा, हर व्यक्ति के हाथ में आजकल अखबार है… कंप्यूटर जैसा मोबाइल फोन अपने आप में एक अखबार है ऐसी स्थिति में तेज गति से दौड़ना पड़ रहा है लेकिन राष्ट्र की भलाई के लिए, भारत जैसे उभरते देश के लिए आलोचना बहुत आवश्यक है।

“नीतियों की स्वस्थतापूर्वक आलोचना होगी तभी तो उसका शुद्धिकरण होगा और आलोचना ही तो शुद्धिकरण के द्वार खोल देती है और इसलिए मैं इस बात का पक्षकार हूं कि हम जितनी ज्यादा सटीक आलोचना करेंगे उतनी व्यवस्थाओं में शुद्धि आएगी और जितने ज्यादा आरोप लगाएंगे उतनी हम हमारी ताकत खो देंगे। समय की मांग है आरोपों से मुक्ति पा करके आलोचना के राह को प्रबल बनाएं ताकि भारत के उजज्वल भविष्य के लिए हम भी बड़ा उत्तम योगदान दे सकें।”


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