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सरकारी विज्ञापन में नेताओं के फोटो न हों : सुप्रीम कोर्ट


download नई दिल्ली,(एजेंसी) 9 जनवरी । सरकारी विज्ञापनों में पब्लिक मनी का दुरुपयोग रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट की कमिटी ने गाइडलाइंस शीर्ष अदालत के सामने पेश कर दी हैं। गाइडलाइंस के मुताबिक सरकारी विज्ञापन में सत्ताधारी पार्टी का नाम और राजनीतिक पार्टी के नेता का फोटो नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच के सामने सुप्रीम कोर्ट की कमिटी ने रिपोर्ट सौंपी। प्रोफेसर एन. आर. माधव मेनन की अगुवाई वाले पैनल ने कहा है कि गवर्नमेंट एडवरटाइजमेंट (कंटेंट रेग्युलेशन) गाइडलाइंस 2014 सभी सरकारी विज्ञापन पर लागू होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और अन्य पक्षों से जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 फरवरी की तारीख तय की गई है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आदेश पारित करने से पहले सभी पक्षों को सुना जाएगा।

गाइडलाइंस के मुताबिक सरकारी विज्ञापन में न तो पार्टी का नाम, न पार्टी का सिंबल या लोगो, न पार्टी का झंडा और न ही पार्टी के किसी नेता का फोटो होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी विज्ञापन में नेताओं के फोटोग्राफ छापने से बचना होगा। अगर लगता है कि सरकार का सही संदेश देने के लिए किसी नेता का फोटो छापना जरूरी है तो सिर्फ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गवर्नर और मुख्यमंत्री के फोटो का इस्तेमाल होना चाहिए।

डीम्ड यूनिवर्सिटी पर यूजीसी की खिंचाई

सुप्रीम कोर्ट ने डीम्ड यूनिवर्सिटी के इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी के स्ट्रेंथ के फिजिकल वेरिफिकेशन के मामले में यूजीसी के लचर रवैये की जमकर खिंचाई की है। केंद्र द्वारा बनाई गई कमिटी ने जिन यूनिवर्सिटी को ब्लैक लिस्ट किया था उनका वैरिफिकेशन होना है।

जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस विक्रमजीत सेन की बेंच को जब बताया गया कि यूजीसी ने 7 यूनिवर्सिटीज को ब्लैक लिस्ट करने के मामले में केंद्र को अब तक रिपोर्ट नहीं सौंपी है, अदालत ने कहा, ‘आप घोंघे की चाल क्यों चल रहे हैं ? यूजीसी जागने का नाम ही नहीं ले रही। आप एक वैधानिक संस्था हैं पर दुर्भाग्यवश आप अपना वैधानिक कर्तव्य नहीं निभा रहे। आपको नींद से जगाने की जरूरत है।’ यह टिप्पणियां उस वक्त की गईं, जब यूजीसी की तरफ से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल मनिंदर सिंह यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि किन वजहों से देरी हुई।

मनिंदर सिंह का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश में संशोधन की जरूरत है। आयोग पी. एन. टंडन कमिटी की सिफारिशों के अनुरूप डीम्ड विश्वविद्यालयों को ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ के रूप में श्रेणीबद्ध नहीं कर सकता। यूजीसी ने कहा कि वह सिर्फ निरीक्षण कर सकती है और ऐसे विश्वविद्यालयों का जवाब हासिल करने के बाद केंद्र को रिपोर्ट देगी और केंद्र को सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना है । यूजीसी, केंद्र एवं अन्य पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बेंच ने आयोग से कहा कि वह 7 ऐसे विश्वविद्यालयों और गुरुकुल कांगडा विश्वविद्यालय के भौतिक सत्यापन पर उसके 26 सितंबर 2014 के आदेश का पालन 4 हफ्ते के भीतर करे।


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