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अभी अभी : हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका, कहा- जज और मंत्री एक समान नहीं


जजों को मंत्रियों के समकक्ष रखे जाने की मांग वाली एक याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने खारिज कर दी। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि हाईकोर्ट के जज अलग शक्तियां, विशेषाधिकार और कर्तव्य रखते हैं। उन्हें मंत्रियों के बराबर नहीं रखा जा सकता। मंत्री और जज दोनों अलग-अलग वर्ग से हैं, उनके बीच तुलना नहीं की जा सकती।
अधिवक्ता अशोक पांडे व अन्य अधिवक्ताओं की ओर से वर्ष 2010 में दायर इस याचिका में मंत्रियों की परिभाषा को चुनौती दी गई थी। याची का कहना था कि सभी मंत्री बराबर हैं। साथ ही हाईकोर्ट के जजों को मंत्रियों के समकक्ष रखे जाने की भी मांग की गई थी।

सभी पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस वीरेंद्र कुमार द्वितीय ने कहा कि इसी याचिका में हाईकोर्ट ने पूर्व में कहा था कि जज न्यायिक सेवा से आते हैं। न्यायिक सेवा को रोजगार के रूप में नहीं देखा जा सकता। वे कर्मचारी नहीं हैं। वे न्यायपालिका के सदस्य हैं। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को हमारे लोकतंत्र के तीन स्तंभ माना गया है।

तीनों ही अंगों के अलग-अलग कार्य, शक्तियां, जिम्मेदारियां और कर्तव्य हैं। जजों और अन्य सेवाओं के सदस्यों के सेवा नियमों के बीच संबंध नहीं माना जा सकता। न ही उनकी आपस में तुलना की जा सकती है। ऐसे में याची द्वारा हाईकोर्ट के जजों को मंत्रियों के बराबर रखने की प्रार्थना दो गैर-बराबरों में समानता मांगने जैसी है।

संविधान मंत्रियों के बीच भेद नहीं करता

इसी याचिका में हाईकोर्ट में सैलरी एंड अलाउंसेस ऑफ मिनिस्टर्स एक्ट 1952 और यूपी मिनिस्टर्स एक्ट 1981 के कुछ प्रावधानों को भी चुनौती दी गई थी। याची का कहना था कि संविधान एक मंत्रिपरिषद बनाने की बात करता है, जो राष्ट्रपति को सुझाव और मदद देगी। इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री के सुझाव पर राष्ट्रपति खुद करेंगे।
पीएम सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोकसभा सदस्यों की संख्या से 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। वहीं राज्य सरकार के लिए भी किए गए प्रावधानों का उल्लेख किया गया, जिनमें राज्यपाल के जरिए नियुक्तियां की जानी चाहिए थीं। याची का कहना था कि संविधान ने केवल एक ही तरह के मंत्रियों का उल्लेख किया है। ऐसे में संसद और प्रदेशों की विधानसभाएं कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री, उपमंत्री, स्वतंत्र प्रभार मंत्री आदि बनाकर अपने क्षेत्राधिकार से आगे का काम कर रही हैं।

सरकार का तर्क, भेजा गया नोटिस
इस मामले में 2010 में देश के अटॉर्नी जनरल और प्रदेश के महाधिवक्ता को नोटिस भेजा गया था।  गृह मंत्रालय की ओर से कहा गया कि संविधान में कैबिनेट मंत्री या मंत्रिपरिषद को परिभाषित नहीं किया गया है। इसमें लचीलापन संविधान निर्माता ने रखा है। सांविधानिक लक्ष्यों को हासिल करने और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा, संविधान में सभी मंत्री समान
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि याची ने कहीं भी यह साबित नहीं किया है कि संविधान में किस तरह मंत्रिपरिषद को ही कैबिनेट मंत्री माना गया है और बाकियों को उसी स्तर का नहीं बताया गया है। जब मंत्री की बात की जाती है तो केवल कैबिनेट मंत्री नहीं समझा जाना चाहिए। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि सरकार अगर राज्यमंत्री या उप मंत्री बनाती है तो वह मंत्रियों के बीच अंतर रखते हुए संविधान का उल्लंघन करती है।

 

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